प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में हुए महानगरपालिका चुनावों में ‘एनडीए’ को मिली जीत के लिए जनता का आभार व्यक्त किया है। राज्य की उत्साही जनता ने ‘एनडीए’ के सुशासन को आशीर्वाद दिया है, ऐसी भावना श्री मोदी ने व्यक्त की। वहीं महाराष्ट्र में मिली ताजा जीत का श्रेय भाजपा कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री फडणवीस को दिया। कार्यकर्ताओं का कहना है कि फडणवीस ने महानगरपालिका चुनावों में सत्ता का सही उपयोग किया, इसी कारण यह जीत मिली और इसके लिए वे बधाई के पात्र हैं। वास्तविकता यह है कि पालिका के सभी आयुक्त, जिलाधिकारी और पुलिस भाजपा के एजेंटों की तरह ही व्यवहार कर रहे थे। इसी कारण फडणवीस की जीत आसान हो गई। मुंबई के नतीजों पर सभी की निगाहें टिकी थीं। प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री शाह आदि ने मुंबई में प्रचार करने का साहस नहीं दिखाया, क्योंकि भाजपा की हार का डर अधिक था इसलिए भाजपा और शिंदे सेना का संयुक्त आंकड़ा भले ही बहुमत दिखाता हो, लेकिन उनके पास केवल चार का ही बहुमत है। शिवसेना, मनसे, कांग्रेस और ‘अन्य’ मिलकर महानगरपालिका के सदन में सौ से अधिक नगरसेवक विपक्षी बेंचों पर बैठेंगे और ये ‘सौ’ चार के टुटपूंजिए बहुमत पर भारी पड़ेंगे। बहुमत पारे की तरह चंचल होता है। वह कभी भी फिसल सकता है। इसी कारण शिंदे गुट के चुने हुए नगरसेवकों को होटल में ‘नजरबंद’ कर रखा गया होगा। अपार सत्ता, धन और चुनाव आयोग हाथ में होने के बावजूद भाजपा-शिंदे को केवल काठ पर टिका बहुमत ही मिल सका। जयचंद शिंदे ने शिवसेना के पचास से अधिक नगरसेवकों को तोड़ा, लेकिन उनमें से अधिकांश पराजित हो गए। मराठी धरती पर भाजपा और ‘जयचंद’ शिंदे का पैसा और गुंडागर्दी नहीं चली। मुंबई में शिवसेना-मनसे गठबंधन का महापौर (शायद) न बैठे, लेकिन मुंबई पर वर्चस्व मराठी लोगों का यानी ठाकरे भाइयों का ही बना रहा। मुंबई के सभी मराठी इलाकों में शिवसेना-मनसे के उम्मीदवार विजयी हुए और
बाहरी लोगों के इलाकों में भाजपा
को जगह मिली। इसमें कौन-सी चाणक्यगीरी है? यदि फडणवीस मुख्यमंत्री पद पर न होते तो क्या यह परिणाम संभव होता? सत्ता में न रहनेवाले विपक्ष के लिए स्थानीय स्वराज्य संस्थाओं के चुनाव लड़ना कठिन होता है, अखिलेश यादव का यह कथन गलत नहीं है। सत्ता पक्ष के हाथ में प्रशासन, पुलिस, पैसा- सब कुछ होता है और ‘मैं ही चाणक्य’ या ‘धुरंधर’ यह हाईकमान को दिखाने के लिए ऐसे चुनाव हाईजैक किए जाते हैं। महाराष्ट्र में यही चल रहा है। ठाणे में जयचंद शिंदे ने जनता को कौन-सा महान विचार दिया, कौन-सा महान कार्य किया कि उनकी बोगस शिवसेना को बहुमत मिल गया? कल्याण-डोंबिवली को सांस्कृतिक और शिक्षित लोगों का शहर माना जाता है। वहां महानगरपालिका में जयचंद शिवसेना को ५३ सीटें मिलना अकल्पनीय है। नई मुंबई और उल्हासनगर में इन जयचंदों को मिली सीटों के आंकड़े देखकर प्रधानमंत्री मोदी अपनी डिग्री का प्रमाणपत्र फाड़कर फेंक देंगे। इन चुनावों के नतीजे झूठ की पराकाष्ठा हैं। भारतीय जनता पार्टी को देश की हर सत्ता अपने हाथ में चाहिए यहां तक कि हाउसिंग सोसायटी, क्रीड़ा मंडल और गणेश मंडलों के चुनाव भी वह पार्टी के रूप में लड़ती है। केवल जय शाह को क्रिकेट बोर्ड का अध्यक्ष बिना किसी चुनाव के बना दिया गया। सभी सत्ता केंद्र, संस्थाएं और संवैधानिक पद इन्होंने अपने कब्जे में ले लिए। मुंबई महानगरपालिका पर वे इतने वर्षों तक कब्जा नहीं कर पाए। इस बार जयचंद शिंदे की मदद से मराठी माणुस की महानगरपालिका उन्होंने अपने हाथ में ले ली। फडणवीस के राज्य में इस चुनाव के दौरान एक महत्वपूर्ण घटना यह घटी कि ‘एआईएमआईएम’ की महाराष्ट्र में जबरदस्त घुड़दौड़ शुरू हो गई। मुंबई, छत्रपति संभाजीनगर, नांदेड सहित कई महानगरपालिकाओं में
एआईएमआईएम के नगरसेवक
चुने गए। यह संख्या सौ के पार है। जिसके चलते भाजपा में खुशी की लहर है तो क्या यह फडणवीस की चाणक्य नीति है? क्या मुस्लिम समाज के वोट कांग्रेस को न जाकर ओवैसी की पार्टी की ओर मोड़े गए, ताकि भाजपा को राजनीतिक लाभ हो, क्या ऐसी कोई रणनीति पर्दे के पीछे चली? २९ में से २३ महानगरपालिकाओं पर ‘महायुति’ के रूप में भाजपा का कब्जा है। वसई, लातूर, परभणी, चंद्रपुर और मालेगांव में अलग नतीजे आए। कोल्हापुर में कांग्रेस के सतेज पाटील ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी और वहां कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी। चंद्रपुर में कांग्रेस ने जीत दर्ज की। जिन २३ महानगरपालिकाओं में जीत का ढोल पीटा गया, उनमें से कम से कम १७ में भाजपा ‘बैसाखियों’ पर निर्भर है। धुरंधरों के नाम पर बैंड बजाने वालों को यह समझ लेना चाहिए। जिस पार्टी के हाथ में अपार सत्ता हो, उसे ऐसा परिणाम न मिलता तो आश्चर्य होता। चुनाव आयोग भ्रष्टाचार की दीमक से खोखला हो चुका है इसलिए वह बिल्ली बन गया है। मतदाताओं की शिकायतें और गुस्से की आवाजें उसके कानों तक नहीं पहुंचतीं। पुलिस वर्दी में भाजपा कार्यकर्ताओं की तरह ड्यूटी कर रही है। इन प्रतिकूल परिस्थितियों में भी, ‘ठाकरे बंधु’ ने संघर्ष किया। मराठी माणुस एकजुट होकर उनके पीछे खड़ा रहा। बहुसंख्य मराठी जनता ने शिवसेना-मनसे को वोट दिया। जिन्होंने भाजपा और जयचंद को वोट दिया, उन्होंने मुंबई के ‘डेथ वारंट’ पर मुहर लगाई। महाराष्ट्र के कातिलों में इन सबकी गिनती होगी। प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि जनता ने ‘एनडीए’ की जनहितकारी, सुशासन की नीतियों को आशीर्वाद दिया है। सभी गुंडों, भ्रष्टाचारियों और व्यभिचारियों को एकत्र कर सरकार और पार्टी बनाने वाले जब सुशासन की बात करते हैं तो क्या कहा जाए? यदि मुंबई महानगरपालिका का कारभार इसी ‘सुशासन’ के पैटर्न पर चला, तो वह ऐतिहासिक इमारत माफियाओं और गुंडों का अड्डा बन जाएगी-सावधान!
