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संपादकीय :  लद्दाख में हिंसा

देशभर के युवाओं में बेरोजगारी, महंगाई और अन्य मुद्दों को लेकर सत्तारूढ़ दल के खिलाफ जो असंतोष धधक रहा है, लद्दाख में भड़की हिंसा उस का सबूत है। बेशक, सत्तारूढ़ दल और उसके समर्थक इसे हमेशा की तरह स्वीकार नहीं करेंगे। उल्टे, वे यह ‘नैरेटिव’ पैâलाने की कोशिश करेंगे कि लद्दाख में हो रही हिंसा भी एक ‘बाहरी साजिश’ है, नेपाल की तरह देश के ‘जेन जेड’ युवाओं को भड़काने की कोशिश की जा रही है, बल्कि यह काम भी शुरू हो गया है। खुद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीधे तौर पर वरिष्ठ पर्यावरणविद् नेता और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक को इस हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया है। गृह मंत्रालय का यह भी कहना है कि बुधवार की हिंसा इसलिए हुई, क्योंकि लद्दाख में आंदोलनकारियों और केंद्र सरकार के बीच बातचीत में प्रगति कुछ समूहों को चुभ रही थी। अगर सरकार ने ऐसा करने के बजाय लद्दाख के लोगों की मुख्य मांगों को लेकर अपने वादे पूरे किए होते तो न तो वहां के युवाओं को आंदोलन करने के लिए मजबूर होना पड़ता और न ही बुधवार की हिंसा होती। मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद ३७० हटाने के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए। इसके बाद जम्मू-कश्मीर को विधानसभा मिली और वहां के लोगों को अपनी सरकार चुनने की आजादी मिली, लेकिन लद्दाख के लोगों को यह
अधिकार देने के लिए
केंद्र सरकार टालमटोल कर रही है। मोदी सरकार ने लद्दाख को एक स्वतंत्र राज्य का दर्जा देने का भी वादा किया था, लेकिन लद्दाख को स्वायत्तता या स्वतंत्र राज्य का दर्जा नहीं मिला। मोदी सरकार अपने किए वादों से मुकर गई इसलिए अगर वहां के स्थानीय लोगों और युवाओं में उनके साथ विश्वासघात हुआ है, यह भावना भड़क रही है तो मोदी सरकार इस ‘असंतोष की जनक’ है। लद्दाख के लोगों की क्या मांगें हैं? लद्दाख को एक स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिया जाए, संविधान की छठी अनुसूची के अनुसार लद्दाख को आदिवासी राज्य का दर्जा दिया जाए, सरकारी नौकरियों में स्थानीय लोगों को आरक्षण दिया जाए और लेह और कारगिल में दो लोकसभा क्षेत्र बनाए जाएं। सोनम वांगचुक और अन्य नेता इन मांगों को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। पिछले साल, सोनम वांगचुक इन मांगों को लेकर दिल्ली पहुंचे थे, लेकिन उन्हें दिल्ली सीमा पर गिरफ्तार कर लिया गया और विरोध को दबा दिया गया। अब भी सरकार ने ३५ दिनों से चल रहे विरोध प्रदर्शन को नजरअंदाज ही किया है। आंदोलनकारियों के साथ एक बैठक बुलाई गई थी वह भी ६ अक्टूबर को। यह वहां की जनता
के घाव पर नमक छिड़कने
जैसा था। बुधवार को जब लद्दाख में ‘जेन जी’ ने हिंसक रूप धारण कर लिया तो केंद्र ने आनन-फानन यह बैठक की। सरकार को यह समझदारी पहले क्यों नहीं सूझी? लद्दाखवासियों की मांगें नई नहीं हैं और उन्हें पूरा करने के केंद्र के वादे भी नए नहीं हैं। हालांकि, केंद्र ने खुद अपने ही वादे तोड़ दिए। इसी के चलते आज लद्दाख जैसा शांत और संवेदनशील क्षेत्र अशांति के कगार पर है। उनकी मांगों के प्रति सरकार का टालमटोल भरे रवैए के चलते लद्दाख के लोगों और युवाओं में उनके साथ विश्वासघात होने की भावना फैल रही है। इस असंतोष को गलत कैसे कहा जा सकता है? हालांकि, इसके लिए सरकार जिम्मेदार है, लेकिन सरकार ने बुधवार की हिंसा के लिए सोनम वांगचुक जैसे नेता को दोषी ठहराकर अपना पल्ला झाड़ दिया है। सरकार की यह नीति देश के एक और सीमावर्ती और संवेदनशील राज्य को अशांति और अराजकता की खाई में धकेल सकती है। केंद्र सरकार को राजनीतिक लाभ-हानि, जोड़-घटाने को दरकिनार करके और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए लद्दाख के संबंध में तत्काल निर्णय लेना चाहिए, जिससे लद्दाख ‘मणिपुर’ नहीं बनेगा और चीनियों के हाथ कोई मौका नहीं लगेगा। बुधवार को लद्दाख में भड़की हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन हुक्मरान क्या अब भी उनकी चेतावनी पर ध्यान देंगे?

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