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संपादकीय : युद्ध क्यों रुकवाया?..जनरल चौहान का सत्य कथन

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पीछे हटने का रहस्य धीरे-धीरे सामने आ रहा है। ईरान-इजरायल युद्ध में ईरान ने अमेरिका और इजरायल को पूरी तरह से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। इजरायल का अहंकार खत्म कर दिया, वहीं राष्ट्रपति ट्रंप के दबाव में प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान के साथ युद्ध रोक दिया और भारतीय सेना के साथ दगाबाजी की। प्रधानमंत्री मोदी और अन्य लोगों ने चुनाव के दौरान पाकिस्तान को सबक सिखाने की कितनी भी लफ्फाजी की हो, हकीकत में भारत एक बड़े युद्ध के लिए तैयार नहीं था। अब यह स्पष्ट हो रहा है कि भारत हर तरह से परावलंबी था। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने जोर देकर कहा कि हम आज के आधुनिक युद्ध कल के हथियारों से नहीं लड़ सकते। आज के युद्ध के लिए हमें स्वदेशी निर्माण के भविष्य के अनुकूल उन्नत तकनीक से लैस होने की आवश्यकता है। जनरल चौहान की राय मुख्य रूप से भारतीय रक्षा क्षमताओं में परिलक्षित होती है। प्रधानमंत्री मोदी, रक्षा मंत्री और अन्य ने पिछले दस वर्षों में रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता लाने की बात की है। सच तो यह है कि रूस, फ्रांस, स्वीडन और अमेरिका से हमें भारी मात्रा में हथियार, फाइटर जेट्स और हेलिकॉप्टर खरीदने पड़ते हैं। मिग, सुखोई, राफेल, बोफोर्स, अगस्ता वेस्टलैंड जैसे ‘नाम’ रक्षा विभाग के विदेशी निर्भरता के प्रतीक हैं। जब फ्रांस से राफेल विमानों की पहली खेप आई तो भाजपा ने देश में दिवाली मनाई। यह शर्मनाक था। लड़ाकू विमान विदेश से लाए जाने की आप वाह-वाही कैसे कर सकते हैं? प्रधानमंत्री मोदी दुनियाभर में घूमते रहे। वे ‘मंदिर-मस्जिद’, ‘हिंदू-मुस्लिम’ की बात करते रहे, लेकिन वे भारत को
रक्षा के मामले में
आत्मनिर्भर नहीं बना पाए इसीलिए पुलवामा और पहलगाम जैसी घटनाएं हुईं और पाकिस्तान के साथ युद्ध समेटना पड़ा। विदेशी तकनीक पर निर्भरता हमारी रक्षा तैयारियों को कमजोर करती है और रक्षा सामग्रियों की स्वदेशी उत्पादन क्षमता को सीमित करती है। अति आवश्यक सामग्रियों की २४ घंटे उपलब्धता भी प्रभावित होती है। जनरल अनिल चौहान ने स्पष्ट किया कि हम अपनी रक्षा के लिए आवश्यक आयातित तकनीक पर लंबे समय तक निर्भर नहीं रह सकते। जनरल चौहान ने अप्रत्यक्ष रूप से ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत के पीछे हटने के कारणों को समझाया। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में न केवल राजनीतिक हस्तक्षेप था, बल्कि अमेरिका जैसे राष्ट्र का भी हस्तक्षेप था। चीन, अजरबैजान और तुर्की जैसे देश खुलकर पाकिस्तान के पक्ष में खड़े थे। इस प्रकार भारत की लड़ाई तीन राष्ट्रों के साथ थी। इसके लिए मोदी सरकार की विफल विदेश नीति जिम्मेदार है। मोदी काल में रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री का महत्व बहुत कम हो गया है और फिर सैन्य राजनीति शुरू हो गई है। इस बात का ध्यान रखा गया कि भारतीय सेना में राष्ट्रवाद के बजाय धार्मिक कट्टरता का जहर घोला जाए। यह आश्चर्यजनक है कि जब दुनिया के अन्य देश हथियारों, सैन्य उपकरणों, परमाणु हथियारों और सैन्य संख्या के मामले में आत्मनिर्भर हो रहे हैं, तब भारत को ऐसा करने की जरूरत महसूस नहीं हो रही है। जनरल अनिल चौहान ने साफ किया कि देश का राजनीतिक नेतृत्व कश्मीर मुद्दे को सुलझाकर पाकिस्तान को धूल चटाने का मौका मिलने के बावजूद, क्यों अपमानित हुआ? अपने
देश की बदनामी
के लिए जिम्मेदार कौन है, लोकतंत्र में नागरिकों को यह जानने का अधिकार है। सरकार को अपने अच्छे और बुरे कामों के लिए जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए, लेकिन जब सरकार ऐसा करने से इनकार करती है तो किसी न किसी को यह जिम्मेदारी उठानी ही पड़ती है। जनरल अनिल चौहान ने अब यह जिम्मेदारी संभाली है। भारत को इस तथ्य पर विचार करना होगा कि वर्तमान युद्ध अब सामरिक नहीं रहा, बल्कि ‘ड्रोन’ के उपयोग के कारण मानवरहित हो गया है। ईरान ने इजरायल के अभेद्य किले को ध्वस्त कर ‘आयरन डोम’ का मिथक ध्वस्त कर दिया। दाढ़ी वालों द्वारा रक्षा में बनाई गई आत्मनिर्भरता के आगे अमेरिका और इजरायल ने घुटने टेक दिए। ईरान ने दिखाया कि एक देश के रूप में वह अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला करने की शक्ति रखता है। भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में ठीक इसके विपरीत किया। हम विदेशी राफेल पर निर्भर थे इसलिए अमेरिका ने हम पर युद्ध रोकने का दबाव डाला और प्रधानमंत्री मोदी ने इसे स्वीकार कर लिया। यह युद्ध इतनी जल्दी समाप्त हो गया कि हमारे लोगों को ठीक से पता ही नहीं चला कि यह युद्ध शुरू हो गया है। यदि युद्ध लंबा चलता तो हमें युद्ध सामग्री के लिए विदेशी देशों पर निर्भर रहना पड़ता और यह निश्चित नहीं था कि ऐसे समय में कौन-सा देश भारत के साथ खड़ा होता इसलिए जनरल अनिल चौहान का यह कथन कि आधुनिक युद्ध के लिए स्वदेशी तकनीक की आवश्यकता है, सत्य है। मोदी के अमृतकाल में गाय, गोबर, गोमूत्र, मंदिर और पूजा-पाठ प्रचुर मात्रा में हैं, लेकिन विज्ञान और आधुनिकता का ह्रास हुआ है। यह आधुनिकता फ्रांस, जर्मनी और अमेरिका से उधार लेनी पड़ती है!

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