सामना संवाददाता / मुंबई
महाराष्ट्र में सूखे से परेशान किसानों की नाराजगी अब सरकारी राहत व्यवस्था के खिलाफ खुलकर सामने आ रही है। फसल नुकसान से जूझ रहे किसानों ने ५,००० की अंतरिम सहायता को बेहद अपर्याप्त बताते हुए सवाल उठाया है कि इतनी रकम से खेती का नुकसान कैसे पूरा होगा और अगली बुवाई के लिए पैसा कहां से आएगा?
किसान संगठनों का कहना है कि बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी और सिंचाई पर हजारों रुपये खर्च करने के बाद यदि फसल बर्बाद हो जाए तो ५,००० की सहायता वास्तविक नुकसान के सामने बहुत छोटी रकम है। अखिल भारतीय किसान सभा से जुड़े नेताओं ने मांगें पूरी नहीं होने पर २६ अक्टूबर से मुंबई की ओर वाहन मार्च निकालने की चेतावनी दी थी। हालांकि सोमवार को मार्च शुरू होने और उसमें शामिल किसानों की संख्या की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
किसानों की मांग केवल पांच हजार की नहीं!
किसान संगठनों ने फसल नुकसान का उचित सर्वेक्षण, लंबित बीमा दावों का भुगतान, कृषि कर्ज में राहत और सिंचाई सुविधाओं की मांग उठाई है। उनका कहना है कि सूखा प्रभावित क्षेत्रों में केवल तत्काल नकद सहायता से कृषि संकट का स्थायी समाधान नहीं होगा। महाराष्ट्र के कई इलाकों में कमजोर वर्षा और पानी की कमी से खेती प्रभावित हुई है। ऐसी परिस्थितियों में किसानों को अगली फसल की तैयारी के लिए भी आर्थिक मदद की आवश्यकता होती है। फसल बीमा भुगतान में देरी होने पर किसानों को साहूकारों या अन्य स्रोतों से महंगा कर्ज लेने की नौबत आ सकती है। इससे कृषि संकट और गहरा सकता है।
सरकारी घोषणा और वास्तविक राहत में कितना अंतर?
राहत राशि घोषित करना एक कदम है, लेकिन लाभार्थियों के खातों में समय पर पैसा पहुंचना अधिक महत्वपूर्ण है। साथ ही वास्तविक नुकसान का पारदर्शी आकलन भी जरूरी है। सरकार को यह बताना चाहिए कि कितने किसानों को सहायता स्वीकृत हुई, कितनों को भुगतान मिला और कितने आवेदन अभी लंबित हैं। किसान संगठनों की मांगों पर बातचीत और प्रशासनिक कार्रवाई से ही आगे की स्थिति स्पष्ट होगी। खेत में फसल नहीं, जेब में पैसा नहीं और सिर पर कर्ज का बोझ; ऐसे में ५,००० की राहत किसान को दोबारा खड़ा कर पाएगी या केवल सरकारी फाइल में सहायता का आंकड़ा बढ़ाएगी?
