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महाराष्ट्र में वोटरों के नामों पर महाकाट!

-सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछा, आखिर चल क्या रहा है?
-मसौदा सूची से २.०६ करोड़ नाम बाहर होने का मामला अदालत पहुंचा -फॉर्म-६ भरने पर मुकदमे की आशंका दूर, ५ नवंबर को अगली सुनवाई

सामना संवाददाता / नई दिल्ली

महाराष्ट्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर ने ऐसा विवाद खड़ा कर दिया है कि मामला अब सर्वोच्च न्यायालय की चौखट तक पहुंच गया है। राज्य की मसौदा मतदाता सूची से करीब २.०७ करोड़ नाम बाहर होने के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। सुनवाई के दौरान सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि पहले से पंजीकृत मतदाता का नाम हट जाए, तो वह दोबारा नाम दर्ज कराने के लिए कौन-सा फॉर्म भरे और क्या ऐसा करने पर उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता अरुण आनंदगिरि की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार ने दलीलें रखीं।
दातार ने बताया कि जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, उनसे फॉर्म-६ भरने के लिए कहा जा रहा है। लेकिन यह फॉर्म सामान्यतः नए मतदाता के पंजीकरण के लिए होता है। पहले से पंजीकृत व्यक्ति स्वयं को नया मतदाता बताकर आवेदन करे, तो गलत घोषणा का कानूनी प्रश्न पैदा हो सकता है। इस आशंका पर मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि ऐसे आवेदकों के खिलाफ अभियोजन नहीं चलाया जाएगा। हालांकि, अदालत ने फिलहाल एसआईआर प्रक्रिया रोकने या दावे-आपत्तियों की समयसीमा बढ़ाने का एकतरफा आदेश नहीं दिया।
आखिर कितने नाम बाहर हुए?
महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय से संबंधित सार्वजनिक आंकड़ों के अनुसार, लगभग ९.७९ करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से २.०६८ करोड़, अर्थात करीब २१.१४ प्रतिशत नाम मसौदा सूची में शामिल नहीं किए गए। संबंधित निर्वाचन अधिकारियों के अनुसार, ये मतदाता दर्ज पते पर नहीं मिल सके। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में इससे भी व्यापक अनियमितताओं की आशंका जताई। उन्होंने कहा कि मुंबई और पुणे में पुनर्विकास परियोजनाओं के कारण अस्थायी रूप से दूसरी जगह रहने वाले अनेक मतदाताओं को अनुपस्थित बताकर सूची से बाहर किया गया। उन्होंने तार्किक विसंगतियों के आधार पर १.२२ करोड़ नाम हटाने का भी दावा किया। इन अलग-अलग श्रेणियों के आंकड़ों को जोड़कर कुल प्रभावित मतदाताओं की संख्या तय करना अभी उचित नहीं होगा, क्योंकि उनमें दोहराव की संभावना और गणना का आधार स्पष्ट होना बाकी है।
पुनर्विकास में घर बदला, तो वोट भी गया?
मुंबई महानगर क्षेत्र में हजारों परिवार इमारतों के पुनर्विकास के दौरान किराये के मकानों या अस्थायी आवासों में रहते हैं। सवाल यह है कि क्या ऐसे नागरिकों की अस्थायी अनुपस्थिति उन्हें मताधिकार से वंचित करने का आधार बन सकती है? चुनाव आयोग का उद्देश्य मृत, स्थानांतरित, दोहरी या अपात्र प्रविष्टियों को हटाकर मतदाता सूची को सही बनाना है। लेकिन इस प्रक्रिया में पात्र नागरिकों के नाम गलत तरीके से हटना भी उतनी ही गंभीर चिंता है। याचिकाकर्ता ने अदालत से पुनरीक्षण रोकने और नाम बहाली के लिए पर्याप्त समय देने का आग्रह किया। पीठ ने संकेत दिया कि आवश्यकता सिद्ध होने पर समयसीमा के संबंध में उचित निर्देश दिए जा सकते हैं। अब ५ नवंबर की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। सवाल यही है कि मतदाता सूची की सफाई करते-करते कहीं वास्तविक मतदाताओं का लोकतांत्रिक अधिकार तो प्रभावित नहीं हो रहा? आयोग को इस आशंका का जवाब दस्तावेजों और पारदर्शी प्रक्रिया से देना होगा।

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