रत्ना भदौरिया
-एक अनदेखा मानसिक संकट
हमारा समाज तकनीक, विकास और आधुनिकता की ऊंचाइयों को छू रहा है, लेकिन इसी चमक के पीछे एक अंधेरा भी गहराता गया है – अकेलेपन में जीते वृद्धों का अंधेरा। यह महज सामाजिक समस्या नहीं, एक गंभीर मानसिक संकट बन चुका है। जिन हाथों ने पूरी उम्र परिवार को संभाला, जिन आंखों ने बच्चों के सपनों के लिए अपनी नींदें क़ुरबान कीं, वही लोग अपने जीवन की सांझ में मानसिक पीड़ा, उपेक्षा और अकेलेपन से टूट रहे हैं। भारत २०४७ तक दुनिया की सबसे बड़ी वृद्ध आबादी वाले देशों में शामिल होगा, इसलिए यह चुनौती आने वाले वर्षों में और गंभीर रूप ले सकती है।
आंकड़ों के झरोखे से सुलगती हकीकत
वृद्धावस्था अपने आपमें एक कठिन दौर होता है। शरीर कमजोर होने लगता है, बीमारियां बढ़ जाती हैं, आत्मनिर्भरता कम होने लगती है और मन भावनात्मक सहारे की तलाश करता है। भारत में बुजुर्गों की स्थिति पर आई हालिया लॉन्गीट्यूडिनल एजिंग स्टडी इन इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के लगभग ३० प्रतिशत बुजुर्ग डिप्रेशन (अवसाद) के लक्षणों से जूझ रहे हैं और करीब ८ प्रतिशत बुजुर्ग गंभीर मानसिक तनाव का शिकार हैं।
इससे भी ज्यादा दर्दनाक बात यह है कि संयुक्त परिवारों के टूटने के कारण देश में सामाजिक अलगाव तेजी से बढ़ा है। आज भारत में करीब १८.७ प्रतिशत बुजुर्ग महिलाएँ और ५.१ प्रतिशत बुजुर्ग पुरुष पूरी तरह अकेले रहने को मजबूर हैं। जब इसी समय परिवार का साथ छूट जाए, बच्चे व्यस्तता या स्वार्थ में दूर हो जाएं और समाज केवल ‘बोझ’ समझने लगे, तब यह अकेलापन धीरे-धीरे मानसिक बीमारी का रूप लेने लगता है।
तकनीक की चकाचौंध और बढ़ता खालीपन
मोबाइल और सोशल मीडिया ने संवाद के नए अवसर तो दिए हैं, लेकिन कई परिवारों में प्रत्यक्ष मानवीय संवाद की कमी ने भावनात्मक दूरियों को भी बढ़ाया है। एक ही घर में लोग साथ रहते हुए भी मानसिक रूप से अलग हो चुके हैं। सबसे दर्दनाक दृश्य तब होता है जब कोई वृद्ध घंटों दरवाजे की ओर देखता रहता है कि शायद कोई उससे मिलने आएगा। वह फोन की घंटी सुनने के लिए बेचैन रहता है। त्योहार उसके लिए खुशी नहीं, बल्कि खालीपन की याद बन जाते हैं। उस समय उसकी मानसिक स्थिति किसी वैâदी जैसी हो जाती है।
समस्या केवल परिवारों की नहीं, सरकार और समाज की भी है। हमारे यहां वृद्ध मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बेहद कम है। शहरों में कुछ सुविधाएं हैं, लेकिन गांवों और छोटे कस्बों में वृद्ध मानसिक स्वास्थ्य लगभग अनदेखा विषय है, जबकि भारत के ग्रामीण इलाकों में अनपढ़ता और आर्थिक तंगी के कारण बुजुर्ग मानसिक रूप से और भी लाचार हैं। देश के लगभग ७० प्रतिशत बुजुर्ग आर्थिक रूप से पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हैं, जिससे उनका आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य बहुत प्रभावित होता है। न पर्याप्त काउंसलिंग सेंटर हैं, न सामाजिक सहारा। वृद्धावस्था पेंशन या दवाइयों से केवल शरीर जिंदा रखा जा सकता है, मन नहीं।
जिम्मेदारी नहीं, सम्मानित समझें
जरूरत इस बात की है कि हम वृद्धों को ‘जिम्मेदारी’ नहीं, ‘सम्मान’ समझें। परिवारों को यह समझना होगा कि माता-पिता केवल पालन-पोषण करने वाली मशीन नहीं होते। वे भावनाएं रखते हैं, उन्हें बात करने के लिए इंसान चाहिए, अपनापन चाहिए। बच्चों को चाहिए कि वे रोज कुछ समय अपने माता-पिता के साथ बिताएं, उनकी बातें सुनें, उन्हें महसूस कराएं कि वे अब भी परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
समाज को भी आगे आना होगा। मोहल्लों, सामाजिक संस्थाओं और स्थानीय समुदायों को बुजुर्ग-हितैषी कार्यक्रम चलाने चाहिए जहां वृद्ध लोग मिल-जुल सकें, अपनी भावनाएं बांट सकें और अकेलेपन के इस जानलेवा भंवर से बाहर निकल सकें।
वृद्धों का अकेलापन केवल उनकी व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि हमारे समाज की संवेदनात्मक विफलता का दर्पण है। यदि हम अपने बुजुर्गों को सम्मान, संवाद और भावनात्मक सहारा नहीं दे पाए, तो विकास की सारी उपलब्धियां अधूरी रह जाएंगी। किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे अनुभवी और सबसे कमजोर नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। इसलिए समय की मांग है कि वृद्धों के मानसिक स्वास्थ्य को परिवार, समाज और नीति-निर्माण के केंद्र में रखा जाए, क्योंकि सम्मानजनक और संवेदनशील वृद्धावस्था केवल बुजुर्गों का अधिकार नहीं, बल्कि एक मानवीय समाज की पहचान है।
उम्र का तकाजा या अपनों की उपेक्षा?
आज लाखों बुजुर्ग डिप्रेशन, एंजायटी, अनिद्रा, भय, तनाव और स्मृति संबंधी रोगों (जैसे डिमेंशिया) से जूझ रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में ७० वर्ष या उससे अधिक उम्र के लगभग १४ प्रतिशत बुजुर्ग किसी न किसी मानसिक विकार के साथ जी रहे हैं। सबसे दुखद बात यह है कि उनकी बीमारी को बीमारी माना ही नहीं जाता। अगर कोई वृद्ध घंटों चुप बैठा रहता है, लोगों से बात करना बंद कर देता है, बार-बार रोता है या जीवन से निराश बातें करता है, तो परिवार अक्सर कह देता है – ‘बुढ़ापे में ऐसा तो होता ही है।’ यही सोच सबसे खतरनाक है। मानसिक बीमारी उम्र का सामान्य हिस्सा नहीं, बल्कि उपेक्षा और अकेलेपन का परिणाम है। मानसिक बीमारी से जूझ रहे वृद्धों की पीड़ा इसलिए भी भयावह है कि वे अक्सर अपनी तकलीफ बता नहीं पाते। उन्हें डर होता है कि लोग उन्हें ‘पागल’ न समझ लें। भारतीय समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर आज भी शर्म और अज्ञानता मौजूद है। वृद्ध अगर मनोचिकित्सक के पास जाए, तो परिवार तक असहज महसूस करता है। नतीजा यह होता है कि बीमारी बढ़ती जाती है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में होने वाली कुल आत्महत्याओं में से लगभग १६.६ प्रतिशत (यानी हर छठा व्यक्ति) ७० वर्ष या उससे अधिक उम्र के बुजुर्ग होते हैं।
