मुख्यपृष्ठस्तंभचुनाव करीब और दंगों की एंट्री!

चुनाव करीब और दंगों की एंट्री!

-संगीत सोम ने छेड़ा २०१३ का जिक्र, अखिलेश-राहुल-ओवैसी पर लगाया यूपी में दंगा कराने की कोशिश का आरोप
-सहारनपुर विवाद पर सियासत तेज, सवाल, क्या विकास के मुद्दों से फिर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रही राजनीति?

उत्तर प्रदेश में चुनावी तापमान चढ़ना शुरू हुआ और राजनीति की शब्दावली में एक बार फिर ‘दंगा’ लौट आया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंदू-मुस्लिम मुद्दों को लेकर अपने बयानों से कई बार विवादों में रहे भाजपा के पूर्व विधायक संगीत सोम ने अब विपक्ष पर सीधे प्रदेश में दंगा कराने की कोशिश का आरोप लगाया है।
पत्रकारों से बातचीत में सोम ने २०१३ के मुजफ्फरनगर दंगों की याद दिलाते हुए कहा कि अखिलेश यादव उस दौर की आग को ठंडा नहीं होने देना चाहते। उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव, राहुल गांधी और असदुद्दीन ओवैसी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फिर से दंगा कराने की कोशिश कर रहे हैं।
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद गिराए जाने के बाद राजनीतिक विवाद पहले ही तेज है। प्रशासन का कहना है कि निर्माण सरकारी जमीन पर अनधिकृत था और अदालत में मस्जिद प्रबंधन की अपील खारिज होने के बाद कार्रवाई की गई। दूसरी ओर मस्जिद प्रबंधन ने ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। मलबा हटाने के दौरान करीब २० मीटर गहरा कुआं भी मिला है। फिलहाल उसकी उम्र और ऐतिहासिक महत्व की जांच की जा रही है।
इसलिए उसे ४०० साल पुराना बताना अभी जांच से पहले का दावा है। लेकिन संगीत सोम ने पूरे विवाद को सीधे हिंदू-मुस्लिम राजनीति से जोड़ दिया। उनका कहना है कि सहारनपुर में मस्जिद नहीं, बल्कि अवैध जमीन पर बना अवैध निर्माण हटाया गया। उन्होंने यहां तक कहा कि प्रदेश में जहां भी ऐसी अवैध इमारतें मिलेंगी, उन्हें गिराया जाएगा और कोई रोक नहीं सकता। इसके बाद सोम का बयान और ज्यादा राजनीतिक हो गया। उन्होंने कहा कि अब लड़ाई इस बात की है कि ‘मुसलमानों का आका कौन है, राहुल गांधी, अखिलेश यादव या ओवैसी?’ उन्होंने तीनों नेताओं की तुलना ‘अमर अकबर एंथोनी’ से करते हुए उन पर मुस्लिम वोटों के लिए प्रतिस्पर्धा करने का आरोप लगाया। यहीं असली सवाल खड़ा होता है। उत्तर प्रदेश में रोजगार, महंगाई, किसानों की आय, कानून-व्यवस्था, शिक्षा, पेपर लीक, सड़कों और स्वास्थ्य जैसी समस्याएं कम नहीं हुई हैं। फिर चुनाव करीब आते ही राजनीतिक बहस में २०१३ के दंगे, मस्जिद, मुसलमान और धार्मिक पहचान सबसे आगे क्यों आ जाते हैं? अखिलेश यादव और ओवैसी ने सहारनपुर में सुबह-सुबह हुई कार्रवाई के समय और तरीके पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष इसे संवैधानिक अधिकार और प्रशासनिक निष्पक्षता का मुद्दा बता रहा है, जबकि भाजपा इसे अवैध कब्जा हटाने की कार्रवाई कह रही है। लेकिन संगीत सोम का ‘फिर दंगा करवाना चाहते हैं’ वाला आरोप राजनीतिक तापमान को एक कदम और ऊपर ले जाता है। क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश ने दंगों की कीमत केवल चुनावी आंकड़ों में नहीं, बल्कि जान-माल, विस्थापन और वर्षों तक चले सामाजिक अविश्वास में चुकाई है। इसलिए चुनाव से पहले दंगों की चर्चा शुरू होना अपने आप में खबर है। और उससे बड़ा सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश का अगला चुनाव कामकाज के हिसाब पर लड़ा जाएगा या एक बार फिर हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के पुराने फॉर्मूले पर?

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