धीरज फूलमती सिंह
मुंबई
थियेटर के दोस्तों से फिल्म की खूब तारीफ सुनी थी। लगा कि अगर मैंने नहीं देखी तो पिछड़ जाऊंगा। सो, ऑफिस के पास के मल्टीप्लेक्स में पहुंच गया। लेकिन फिल्म शुरू होने से पहले ही पंद्रह मिनट के विज्ञापन और आने वाली फिल्मों के अनचाहे ट्रेलर देखकर धैर्य जवाब देने लगा। फिल्म शुरू हुई तो लगा अब कहानी में डूब सकूंगा, लेकिन आसपास का माहौल किसी मेले से कम नहीं था। अंधेरे का फायदा उठाते कुछ कपल्स अपनी ही दुनिया में खोए थे। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि लोग फिल्म देखने आते हैं या एक-दूसरे की मौजूदगी महसूस करने? इतने में सामने बैठे परिवार के पास मल्टीप्लेक्स का कर्मचारी पहुंच गया ‘सर, वुड यू लाइक टू प्लेस सम ऑर्डर? एक्स्ट्रा चीज? समथिंग टू ड्रिंक?’ स्क्रीन पर नसीरुद्दीन शाह अपने अभिनय से बांधने की कोशिश कर रहे थे और इधर ऑर्डर लेने का सिलसिला चल रहा था। तभी किसी का मोबाइल भी बज उठा। लगा, थिएटर नहीं, रेलवे स्टेशन पर बैठा हूं।
कुछ देर बाद बगल वालों की खुसुर-पुसुर शुरू हो गई। तीन लोग थे और दो बड़ी बाल्टियां पॉपकॉर्न की। फोन निकालने और पॉपकॉर्न संभालने की उनकी मशक्कत देखकर फिल्म से ज्यादा उनका अभिनय मनोरंजक लगने लगा।
पीछे बैठी दो लड़कियां पूरे समय बातें करती रहीं। जब पर्दे पर हीरो-हीरोइन का भावनात्मक दृश्य चल रहा था, तब वे अगली फिल्म की योजना बना रही थीं। आखिरकार मुझे हाथ जोड़कर उनसे चुप रहने की विनती करनी पड़ी। इंटरवल में फिर वही सवाल ‘सर, वुड यू लाइक टू प्लेस सम ऑर्डर?’ बगल वालों के पास पॉपकॉर्न की एक और बाल्टी आ गई। उन्हें देखकर मैंने भी अनमने मन से कुछ मंगा लिया। घर लौटते समय मन में एक ही सवाल था कि क्या जमाना सचमुच नाकाबिले-बर्दाश्त हो गया है या हम सार्वजनिक जगहों पर दूसरों का ध्यान रखने की संस्कृति भूलते जा रहे हैं? अब फिल्म से ज्यादा दर्शकों का ड्रामा देखने को मिलता है। ऐसे में समझ नहीं आता कि टिकट फिल्म का खरीदते हैं या थिएटर में बैठे लोगों के व्यवहार का।
