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विशेष : भारत की आवाज बनने की कोशिश में जेन जेड

पं. प्रेम बरेलवी

भारत की आजादी से लेकर लोकतंत्र की मजबूत आवाज के वाहक यहां के आंदोलन रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से आंदोलनों की आवाजें कुचली और दबाई जा रही हैं। कोरोना-काल में तीन काले कृषि कानूनों से लेकर पेपर लीक को लेकर विद्यार्थियों की आवाज तक को दबाया गया है। आज भी भारत के अलग-अलग राज्यों में बड़े-बड़े आंदोलन चल रहे हैं, लेकिन उन्हें प्रमुखता से खबरों का हिस्सा नहीं बनाया जा रहा है। लद्दाख से लेकर असम और उत्तराखंड तक युवाओं के आंदोलन भड़के हुए हैं और मौजूदा केंद्र सरकार, जिसका काम देश की जनता की समस्याओं का समाधान करना है, इन आंदोलनों की आवाज को दबाने और कुचलने के घातक प्रयास कर रही है। जिन राज्यों में आंदोलन चल रहे हैं, वहां की सरकारें भी यही काम कर रही हैं।
खतरा!
लद्दाख में भड़के आंदोलन को कुचलने के लिए देश के चर्चित चेहरा सोनम वांगचुक को गिरफ्तार किया गया तो आंदोलन करनेवाले युवाओं पर हर राज्य में लाठियां भांज दी जाती हैं, लेकिन इससे भी दु:ख की बात यह है कि सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी को अब लोग भी लगभग भूल चुके हैं। सितंबर महीने में वांगचुक ने लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा और राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर ३५ दिनों की हंगर स्ट्राइक शुरू की थी। उन्होंने जलवायु परिवर्तन की चिंता, भूमि के अधिकार और स्थानीय संस्कृति की रक्षा की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया था, लेकिन २४ सितंबर को लेह में हिंसा भड़क गई, जिसे रोकने की सोनम वांगचुक ने लद्दाख के युवाओं से अपील भी की थी। हालांकि केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताकर वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत गिरफ्तार कर लिया, जिसे लोकतंत्र और संविधान की गरिमा को बचाने के हामी लोगों ने दमनकारी बताया।
संविधान विशेषज्ञों में कई का मानना है कि देश में न्याय की मांग को लेकर उठनेवाली आवाजों वाले आंदोलनों को दबाने के लिए सरकार और मेनस्ट्रीम मीडिया है। सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी का मुद्दा भी इन्हीं दो ताकतों ने दबा दिया है। अगर सोशल मीडिया न होता तो इन मुद्दों को बिलकुल ही खत्म कर दिया जाता। यही वजह है कि सरकार की आंखों में जन-आंदोलनों की तरह ही सोशल मीडिया भी खटकता रहता है और वह सोशल मीडिया पर मजबूती से उठनेवाली आवाजों को या तो दबा देती है या हमेशा के लिए खामोश करा देती है। भाजपा के सोशल मीडिया ट्रोलर सोशल मीडिया पर न्याय की बात करने वालों को अभद्र गालियां और धमकियां देते हैं। हालांकि, इस बीच नेपाल में सत्ता की निरंकुशता को कुचलने वाली जेन जेड आवाज की तरह अब भारत में भी जेन जेड मजबूत होती जा रही है। जेन जेड आंदोलन को यहां के कुछ लोग भले ही नेपाल की साजिश बताने लगे हैं, लेकिन सरकार को जेन जेड से खतरा भी नजर आने लगा है। आलोचकों का कहना है कि यह मोदी सरकार का तरीका है कि न्याय की गुहार लगानेवाली सामूहिक आवाजों को देश-विरोधी ताकत बताकर कुचल दिया जाए।
भरोसा
वास्तव में बेरोजगारी और गरीबी जैसे मुद्दे देश के लिए भयंकर समस्या बनते जा रहे हैं, लेकिन भाजपा का ध्यान सिर्फ सत्ता कब्जाए रखने पर है। समस्याओं, आपदाओं और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दे आमजन के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। लेकिन सरकार के लिए ये सब मुद्दे नहीं हैं, बल्कि चुनाव में जीत सबसे बड़ा मुद्दा है। हालांकि, लोगों का न्यायिक व्यवस्था और संविधान में भरोसा है। ये दो किरणें लोगों को उनके अधिकारों की रक्षा के प्रति आश्वस्त रखती है। सोनम वांगचुक को न्याय दिलाने की अपील भी देश के सर्वोच्च न्यायालय के पास विचाराधीन है। सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि जे. अंगमो ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की हुई है, जिसमें एनएसए के तहत हिरासत को चुनौती दी गई है। सर्वोच्च न्यायालय इस पर २९ अक्टूबर को सुनवाई करेगा। हालांकि, निराशा तब होती है जब अनेक पीड़ितों को न्यायालयों से भी न्याय नहीं मिल पाता।
सवाल यह उठता है कि भारत में आंदोलनों की आवाज दब क्यों जाती है? क्या इसका कारण सिर्फ सरकार और मीडिया ही है? नहीं, इसका कारण लोग भी हैं जो आंदोलनों को दबाने के लिए बिना सोचे-समझे आगे आ जाते हैं। भारत में सत्ताओं की निरंकुशता का भी कदाचित यही कारण है। क्योंकि सत्ता में बैठे लोग अच्छी तरह जानते हैं कि वे लाख गलत रास्ते पर हों, तब भी उनका पक्ष लेने वालों की संख्या काफी बड़ी होती है। यही वजह है कि जब भी सत्ताओं के खिलाफ कोई आवाज उठतीr है तो कुछ आम लोग ही उसका विरोध करने लगते हैं। आंदोलन कुचलने के लिए आंदोलनकारियों के बीच से ही बिकाऊ लोगों को निकालकर उन्हें खरीद लिया जाता है। इस तरह कोई भी आंदोलन अपनी उद्देश्यपूर्ति होने से पहले ही खत्म हो जाता है।
आंदोलनों के कुचले जाने के लिए आंदोलनों के विरोधी आमजन, अधिकांश जनता की निष्क्रियता, आंदोलनों के साथ रहकर उन्हें कमजोर करने वाले दलाल, सरकारी दमन चक्र, बिकाऊ मीडिया और कानूनी दांवपेंच ही सत्ता में बैठे निरंकुश शासकों के प्रमुख हथियार होते हैं, जिनके दम पर बड़े से बड़े आंदोलन आखिर में समाप्त हो जाते हैं। किसान आंदोलन के बाद से भारत में अनेक आंदोलन कुचले जा चुके हैं और कई आंदोलनकारियों को आंदोलन करने का खामियाजा भुगतना पड़ा है। आज लद्दाख, उत्तराखंड, असम के अलावा भारत के कई राज्यों में छोटे-बड़े अनेक आंदोलन चल रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज पूरे देश की आवाज नहीं बन पा रही है। यही कारण है कि केंद्र सरकार इन आंदोलनों की आवाज को सुनना नहीं चाहती।
लोकतंत्र में जनता को सर्वोपरि माना गया है, लेकिन जनता की आवाज मजबूत आवाज बनकर आज लोकतंत्र को बचाने में असमर्थ है। यही कारण है कि सत्ता में बैठे लोगों के अलावा पुलिस, अफसरशाही और स्वायत्त संस्थाएं तक निरंकुशता के आसन पर अकड़ी बैठी हैं।
आवाज
लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि जिस देश में युवाओं की आवाज नहीं सुनी जाती, उन देशों में कभी-न-कभी आंदोलन की सुनामी आती है, जो सत्ता के निरंकुश शासकों को रौंद देती है। यूरोप के कई देश ऐसी सुनामियों के पूर्व में गवाह रहे हैं और अब एशियाई देशों ने इस सुनामी का स्वाद चखना शुरू कर दिया है। श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल इसका स्वाद हाल के कुछ ही वर्षों में चख चुके हैं। भारत की धरती पर आंदोलनों की नींव पड़ी है तो भारत में आंदोलन की भयंकर सुनामी आने से कब तक रोका जा सकता है? इसलिए सरकार को देश की समस्याओं की तरफ ध्यान देना चाहिए और जनता की आवाज को सुनना चाहिए। वैसे भी अराजकता, निरंकुशता, बढ़ती आपराधिक घटनाओं, महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी जैसे कई मुद्दे लोगों के दिल-ओ-दिमाग को पहले ही परेशान कर चुके हैं। जेन जेड डिजिटल एक्टिविटी के जरिए युवाओं के अलावा अल्पसंख्यकों, किसानों और पर्यावरण की आवाज उठा रही है। देश के लाखों बेरोजगार युवा जेन जेड को अपनी शक्ति के रूप में अपनाने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। जेन जेड भी भारत की आवाज बनने की कोशिश में है। ऐसे में सरकार को इस क्रोध को लंबे समय तक दबाए रखने या नजरअंदाज करने से कुछ हासिल नहीं होगा। उसे चाहिए कि युवाओं के अलावा देश की जनता की आवाज भी सुने। तभी उसके लिए सत्ता की राह भी आसान होगी और चुनाव जीतने में भी आसानी होगी।
(लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।)

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