‘पथिक’ का काम ही है चलना।
पथिक न थमता है, न थकता है।
वो तो उम्मीद लिए, निर्भीकता से
अपनी दिशा तय करने में अग्रसर है।
क्योंकि वो जान गया है कि उसकी मंज़िल के आगे
‘मुकाम’ और भी हैं, जो उसने तय करने हैं।
ज़िंदगी का मक़सद, लक्ष्य हासिल करने के वास्ते
जमकर संघर्ष करना और खुद को सिद्ध करना है… गोया—
“ज़िंदगी आसान तब होगी,
जब हमारे इरादे मजबूत होंगे।
ठान लेंगे तो जीत पाएंगे,
और जो हथियार डाल देंगे,
तो संघर्ष करने के पहले ही मात खा जाएंगे।
हर पल ज़िंदगी का इम्तहान होता है।
ज़िंदगी की बारीकियों को समझने के लिए ही,
‘पथिक’, तू चलता चल… अपनी ही रफ्तार से।
माना कि ज़िंदगी का सफर अनंत है,
फिर भी तू चलता चल… क्योंकि
चलना ही ज़िंदगी है…
थम जाना ‘The End’।”
अतः तू ‘पथिक-धर्म’ निभाता चला।
अपने अंत से पहले, पथिक,
“कुछ तो निशानी छोड़ जा।”
• त्रिलोचन सिंह अरोरा
