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फोकस : मनमाड़-इंदौर रेल लाइन … विकास की रेल एमपी में अटकी! …२५ साल में १८ गुना खर्च

मनमाड़, इंदौर प्रोजेक्ट पर सिस्टम फेल

जेदवी
मनमाड़-इंदौर रेलवे परियोजना आज विकास से ज्यादा सरकारी सुस्ती और राज्यों के बीच तालमेल की विफलता की पहचान बन चुकी है। जिस रेल लाइन की नींव करीब १,००० करोड़ रुपए के अनुमान पर रखी गई थी, वही परियोजना अब १८,००० करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है। बीते २५ वर्षों में १७,००० करोड़ की बढ़ोतरी, यानी खर्च में १८ गुना उछाल यह सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि सिस्टम पर लगा बड़ा सवाल है।

उत्तर महाराष्ट्र, खानदेश और मध्य प्रदेश के आदिवासी-ग्रामीण इलाकों के लिए यह रेल लाइन जीवनरेखा साबित हो सकती थी। मुंबई और इंदौर जैसे दो बड़े आर्थिक केंद्रों के बीच दूरी घटाने वाली यह परियोजना अगर समय पर पूरी होती तो आज तस्वीर कुछ और होती। लेकिन हकीकत यह है कि महाराष्ट्र ने जमीन देकर रास्ता साफ किया, जबकि मध्य प्रदेश की धीमी चाल ने पूरी रेल रोक दी।
महाराष्ट्र तैयार, एमपी बना ब्रेक
परियोजना की जमीनी स्थिति साफ इशारा करती है। धुले जिले के बोरविहीर से नरडाणा तक भूमि अधिग्रहण पूरी तरह हो चुका है। नरडाणा से शिरपुर, पलासनेर (एमपी सीमा) तक अधिसूचना प्रक्रिया अंतिम चरण में है। यानी महाराष्ट्र में अब फाइलें नहीं, काम शुरू होने का समय है।
इसके उलट, मध्य प्रदेश में भूमि अधिग्रहण की रफ्तार बेहद धीमी है। यही देरी इस पूरे प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी बाधा बन चुकी है। नतीजा काम अटका, लागत बढ़ी और समयसीमा बार-बार बदली गई।
सौ साल की फाइल,
पच्चीस साल की देरी
इस परियोजना का इतिहास खुद सिस्टम की कहानी कहता है।
१९०८–१३ में अंग्रेजों ने सर्वे किया, लेकिन फाइल दबा दी गई।
१९१८ में होल्कर रियासत में योजना बनी, अमल नहीं हुआ।
२००२ में सर्वे के लिए फंड मिला।
२००४ में रिपोर्ट तैयार हुई, लेकिन दो राज्यों के बीच समन्वय की कमी ने काम रोक दिया।
२०१९ में धुले–नरडाणा सेक्शन को मंजूरी मिली।
२०२४ में रेलवे बोर्ड को नया प्रस्ताव भेजा गया और एमपी ने १० प्रतिशत हिस्सेदारी मानी।
२०२५ में ड्रोन सर्वे और जमीन अधिग्रहण ने रफ्तार पकड़ी।
देरी की जिम्मेदारी किसकी?
सच साफ है कि महाराष्ट्र ने जमीन दी, प्रक्रिया पूरी की। मध्य प्रदेश की धीमी चाल ने परियोजना को पटरी से उतार दिया। इस देरी का सीधा नुकसान जनता को हुआ। लागत बढ़ी, योजना लटकी और विकास की रफ्तार थमी।
मनमाड़-इंदौर रेल लाइन आज भी उत्तर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के लिए विकास की कुंजी है। लेकिन अब सवाल एक ही है कि मध्य प्रदेश कब जागेगा? १०० साल फाइलों में और २५ साल देरी में निकल चुके हैं। अब अगर केंद्र, रेलवे और राज्य सरकारें एकजुट नहीं हुईं तो यह परियोजना भी सिर्फ महंगे सपने बनकर रह जाएगी।

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