राजन पारकर
बिहार चुनाव २०२५ का नतीजा आ चुका है, लेकिन इसे ‘नतीजा’ कहना भी लोकतंत्र के साथ अन्याय होगा। यह नतीजा नहीं, मतदान मशीन से निकला हुआ एक रहस्योद्घाटन है। जनता ने वोट डाले और ईवीएम ने जवाब दिया, ‘लो भाइयों, ये रहा मेरा मूड!’
मतदान हुआ गणित पर और
नतीजा आया गूगली में!
देखिए न… किसी को २३ प्रतिशत वोट मिले और सीट सिर्फ २५! मतलब एक छात्र ने गणित में १०० में ९० नंबर लाए और स्कूलवालों ने कहा- ‘लड़के को चॉकलेट का कागज दे दो, असली चॉकलेट तो प्रिंसिपल खाएंगे!’ दूसरे को २० फीसदी वोट मिले और सीट ८९! यह तो वही हुआ- घर में चाय मांगी थी और किचन से बिरयानी निकल आई। बिहार का चुनाव नतीजा देखकर तो गणित के टीचर भी इस्तीफा डाल दें।
आरजेडी- जनता ने प्यार का गुलदस्ता दिया, सिस्टम ने कांटों का झोला!
सबसे ज्यादा वोट आरजेडी को मिला, लेकिन सीटें?
अरे भाई, सीटें तो ऐसे मिलीं जैसे किसी ने पिज्जा ऑर्डर किया और डिलिवरी बॉय ने आकर कहा- ‘सॉरी सर, पिज्जा खत्म… सुगंध लेकर आया हूं, सूंघिए और संतोष करिए!’
आरजेडी का पूरा चुनाव अभियान एक महागाथा था। लेकिन परिणाम आया ऐसे जैसे हीरो पूरी फिल्म लड़ता रहा और अंत में खलनायक को ‘बेस्ट एक्टर अवॉर्ड’ मिल गया।
एनडीए- राजनीति की असली जोड़गोली!
बीजेपी को ८९ और जद(यू) को ८५ सीटें। इतना तालमेल तो नवविवाहित जोड़ों के हनीमून पर भी नहीं होता।
एक का भाषण शुरू होता है, दूसरे का खत्म होता है। एक वादा करता है, दूसरा उसे याद भी नहीं रखता।
लेकिन बिहार की जनता ने दोनों को
घर के ‘कॉम्बो पैक’ की तरह खूबसूरती से वापसी करा दी।
छोटे दल- चुनाव का मसाला, सत्ता की खिचड़ी!
छोटे दलों का रोल चुनाव में ऐसा होता है, जैसे बिरयानी में काजू। किसी को पता नहीं होता कि ये कब डाल दिए गए, क्यों डाल दिए गए,
लेकिन फोटो में देखकर सब खुश हो जाते हैं। ये पार्टियां नतीजे के बाद ‘हम किसके साथ जाएं?’ और ‘कौन हमें ज्यादा भाव देगा?’ वाले फेस मोड में चली जाती हैं।
मतदाता- लोकतंत्र का असली कॉमेडियन!
बिहार के वोटर अद्भुत हैं। ये लोग वोट डालने जाते समय बहुत गंभीर होते हैं… पर बटन दबाते वक्त मूड स्विंग पर चल रहा होता है। किसी को ५०,००० वोट, किसी को ५०० वोट और किसी को सिर्फ इतना- ‘अरे भाई, पोस्टर अच्छे थे… वोट नहीं दिया।’
मतदाता इतना अनप्रेडिक्टेबल है कि
उस पर रिसर्च करने के लिए आईआईटी को नया विभाग खोलना पड़ेगा- ‘अज्arूसहू दf न्न्दूग्हु झ्ेब्म्प्दत्दुब् aह् श्दद् एैग्हुे.’
चुनाव आयोग- सबसे शांत किरदार!
नतीजे चाहे वैâसे भी हों, सबसे शांत चेहरा चुनाव आयोग का होता है। कोई घबराहट नहीं, न हड़बड़ाहट, बस एक प्रेस रिलीज और ‘आगे बढ़िए दोस्तों!’ इनके चेहरे पर जो शांति होती है, वह योगीराज की भी पराकाष्ठा है।
राजनीति- एक चलती-फिरती कॉमेडी शो!
चुनाव खत्म हुआ… पर राजनीति नहीं। अब शुरू होगा- कौन किसकी तरफ झुका, किसने किसको फोन किया, किसने किसका नंबर ब्लॉक किया और किसने किसके लिए नया वादा लिखा। नतीजे देखकर ऐसा लगता है कि राजनीति एक रियलिटी शो है, जहां जनता वोट करती है, पर एलिमिनेशन का पैâसला स्क्रिप्ट राइटर करता है।
-लोकतंत्र जिंदा है और व्यंग्य भी!
बिहार का चुनाव नतीजा यह साबित करता है- भारत लोकतंत्र का देश नहीं, ‘लोकमतों का मेगा-थियेटर’ है। जहां जनता ताली बजाती है, नेता डायलॉग मारते हैं और ईवीएम कहती है- ‘अबे, जो हो गया, सो हो गया!’
