राजन पारकर
साल २०१४ की चुनावी रैली में कुछ ऐसे नारे गूंजे थे कि जनता ने तालियां बजा-बजाकर हथेलियां सुजा लीं- ‘इन्कम टैक्स जाएगा, ट्रांजैक्शन टैक्स आएगा!’ जैसे स्वर्ग से कोई देवदूत उतर आया हो।
जनता ने सोचा- अब आम आदमी का पैसा उसी का रहेगा, सरकार नहीं डसेगी! लेकिन हुआ उल्टा! इन्कम टैक्स तो गया नहीं, उलटे डिजिटल जमाने में उसका नया ‘अपग्रेडेड वर्जन’ आ गया।
ऑनलाइन ट्रांजैक्शन करो- चार्ज! एटीएम से पांचवीं बार पैसा निकालो- चार्ज! उस पर भी जीएसटी! यानी ‘पैसे पर टैक्स, टैक्स पर टैक्स’- अच्छे दिन तो आए, मगर बैंक के लिए!
प्रधानमंत्री बोले- ‘वैâशलेस बनो!’ हम बन गए, मगर अब बैंक कहता है- ‘इतना भी डिजिटल मत बनो, सर्वर थक जाता है।’ इसलिए पांच ट्रांजैक्शन के बाद बैंक आराम करता है और उस आराम का बिल हमें थमा देता है। जैसे होटल वाला बोले, ‘पांच पराठे बनाने के बाद मैं थक जाता हूं, अब चाय महंगी।’
काले धन पर रोक लगाने के लिए नोटबंदी की गई पर हुआ क्या? जनता की खाताबंदी! पहले चोर घर के पिछवाड़े से आता था, अब सीधे नेट बैंकिंग के गेटवे से आता है। हमारे पैसे बैंक में पड़े हैं और बैंक हमें ही बताता है, ‘धन्यवाद! आपने राष्ट्रनिर्माण में योगदान दिया।’ वाह! राष्ट्र तो बन ही रहा है- बस फर्क इतना है कि र्इंटें अब हमारे सेवा शुल्क से जुड़ रही हैं।
भिखारी पहले कहता था, ‘दे दाना!’ अब कहता है, ‘क्यूआर कोड स्कैन करो!’
देवता को चढ़ावे में अब कन्विनियन्स फी लगती है, यानी भक्ति भी अब जीएसटी सहित आती है! कभी-कभी लगता है- भगवान भी सोच रहे होंगे, ‘मेरे मंदिर में भी बैंकिंग सिस्टम आ गया!’
आज के बैंकें अब ‘सेविंग संस्थान’ नहीं रहे, वो बन गए हैं ‘चार्ज उत्पादन उद्योग’। हर ग्राहक उनका कच्चा माल है और उससे तैयार होता है- सेवा शुल्क का सोना।
बैंक का हाल आजकल जत्रा (मेला) जैसा है- जहां जनता खेलती है अपने पैसों से और इनाम में बैंक वही पैसे वापस काट कर ले जाता है। बैंकिंग का नया गणित- पैसा रखो – ‘मेंटेनेंस चार्ज।’ पैसा निकालो – ‘ट्रांजैक्शन चार्ज।’ ज्यादा कमाओ – ‘इनकम टैक्स।’ खर्च करो – ‘जीएसटी।’
जनता हैरान – ‘मेरा पैसा मेरा, मगर इस्तेमाल की अनुमति बैंक और सरकार से।’
‘अच्छे दिन’ जरूर आए – मगर वो आए बैंक के खाते में, जनता के खाते में तो सिर्फ ‘चार्जेस’ का रिसीट जमा हुआ।
अब तो हाल ये है – हम ‘सेविंग अकाउंट होल्डर’ नहीं, बल्कि ‘फीस अकाउंट फंडर’ बन चुके हैं।
सरकार कहती है – ‘डिजिटल ट्रांजैक्शन बढ़े तो विकास होता है!’
हां, विकास हो रहा है – मगर जनता का नहीं, बैंक-बैलेंस का!
जनता अब सिर्फ इतना पूछती है – ‘अच्छे दिन आए हैं या बस चार्जेस बढ़े हैं?’
