राजन पारकर
मुंबई वह शहर जिसकी पहचान है-दौड़ती हुई जिंदगी, जागती हुई रातें और संकट में एक-दूसरे के साथ खड़े रहने वाले लोग। मगर इसी मुंबई की भीड़ में अगर कोई इंसानियत को ही जहर की वैâप्सूल में भरकर बांटने की कोशिश करे, तो सवाल सिर्फ एक अपराधी का नहीं, बल्कि उस सोच का है जो इंसानी जान को खिलौना समझती है।
मुहर्रम का जुलूस, हजारों की भीड़, आस्था और श्रद्धा का माहौल और उसी भीड़ में दर्द कम करने के नाम पर मौत बांटने का कथित खेल! यह घटना सिर्फ एक पुलिस केस नहीं, बल्कि समाज के चेहरे पर लगा वह काला धब्बा है जो पूछता है – हम कहां जा रहे हैं? ‘मुंबई में अब चूहों के लिए रखी जाने वाली दवा भी इंसानों की तकदीर लिखने लगी है! फर्क सिर्फ इतना है कि पहले चूहे भागते थे, अब इंसान भरोसे से डरने लगे हैं।’ जिस शहर में डॉक्टर दर्द मिटाने की दवा देते हैं, वहां अगर कोई दवा के नाम पर जहर परोसने लगे तो यह केवल कानून का नहीं, समाज के विश्वास का भी कत्ल है।
कथित तौर पर हजारों लोगों की भीड़ को निशाना बनाने की कोशिश ने एक बड़ा सवाल खड़ा किया है – क्या हमारी सुरक्षा व्यवस्था हर बार किसी हादसे के बाद ही जागेगी, या फिर सतर्कता हमारी आदत बनेगी? मुंबई पुलिस की सतर्कता से बड़ा नुकसान टल गया, लेकिन इस घटना ने चेतावनी दे दी है कि आतंक हमेशा हथियार लेकर नहीं आता; कभी-कभी वह भरोसे की शक्ल पहनकर भीड़ में खड़ा होता है।
सच यह है कि कुछ लोगों की सोच इतनी जहरीली हो चुकी है कि उन्हें इंसानी जिंदगी और कीड़े-मकोड़ों की जिंदगी में फर्क दिखाई नहीं देता। आज जरूरत सिर्फ अपराधी पकड़ने की नहीं, बल्कि उस मानसिकता को पहचानने की है जो समाज की एकता और विश्वास में जहर घोलना चाहती है। क्योंकि मुंबई को जहर का कैप्सूल नहीं चाहिए। मुंबई को चाहिए – जागरूकता की गोली, इंसानियत की दवा और कानून की मजबूत खुराक।
