राजन पारकर
सरकार के सोचने-समझने के सौर पैनल शायद कबके खराब हो चुके हैं, लेकिन किसानों पर वही सोलर पंप जबरदस्ती थोपने की नीति आज भी पूरी ऊर्जा से लागू है।
भाजपा के सुधीर मुनगंटीवार ने जब सरकार के `विद्युत’ खंभे को छुआ तो खुद को ही करंट लग गया, लेकिन किसानों को तो ये झटके सालों से लग रहे हैं।
‘हमें कृषि पंप दो’-ये कहकर हजारों किसानों ने आवेदन किए, चेक भरे, आस लगाई और सरकार ने वही चेक रिफंड करके उन्हें कहा, ‘पंप नहीं मिलेगा, सोलर लो और चुप बैठो।’
ये सरकार खुद तो सोलर बैटरी की तरह है धूप में गरम, अंधेरे में बंद और हमेशा चार्जिंग के मूड में।
जहां भूजल ६० फुट नीचे है, वहां सोलर पंप क्या करेगा?
पानी जमीन के नीचे और सोलर आसमान में, इसमें कोई संबंध है क्या?
सुधीरभाऊ का कटु सत्य बोलना सरकार की `सौर यंत्रणा’ की सच्चाई को नंगा करने जैसा था।
‘ऊर्जा मंत्रालय है, लेकिन ऊर्जा दिखाई नहीं देती।’ ऐसा बाण उन्होंने अपने ही सरकार के नेतृत्व पर चलाया।
घर का भेदी ‘विद्युत’ फोड़े तो बाकी मंत्रीगण भी एक पल को अवाक हो गए। उस पर भास्कर जाधव ने सदन में आग में घी डाला।
‘मई में बेमौसम बारिश ने किसानों की कमर तोड़ दी। मराठवाड़ा और विदर्भ के २६७ किसानों ने आत्महत्या की। यह तो सिर्फ जनवरी से मार्च तक की रिपोर्ट है।’
`कर्जमाफी देंगे, मगर सही समय पर!’
सरकार का यह जवाब वही है जैसे कोई भूखे को कहे, `खाना मिलेगा, मगर जब भगवान चाहेंगे।’
`बहनों को २१०० देंगे,’ चुनाव में कहा, लेकिन न बहनें दिखीं, न रुपए। कुल मिलाकर वादों की सौर ऊर्जा सिर्फ वोटों को बटोरने के लिए चमकाई गई थी। यह सरकार है घोषणाओं का सोलर प्लांट। धूप में दमकता है, लेकिन अंधेरे में ठप पड़ जाता है।
किसानों के जले घावों पर सोलर पंप का पानी छिड़क कर सरकार अपना चेहरा उजला दिखाना चाहती है और वो भी सूर्यप्रकाश में नहीं, बल्कि चुनावी रौशनी में।
