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गपशप : मनपाएं निगल ली गईं पर नहीं निगली जा सकी मुंबई की आत्मा!

राजन पारकर
शिवसेना जब अखंड थी, तब महाराष्ट्र की शहरी सत्ता के नक्शे पर नजर डालते ही एक बात साफ दिखाई देती थी कि मुंबई, कल्याण-डोंबिवली, नासिक, छत्रपति संभाजीनगर, ठाणे, उल्हासनगर, भिवंडी, अहिल्यानगर इन सभी महानगरपालिकाओं में शिवसेना का महापौर हुआ करता था। यह कोई संयोग नहीं था, बल्कि यह मराठी मानुस के राजनीतिक आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति थी। फिर एकनाथ शिंदे ने शिवसेना को तोड़ दिया और हैरानी की बात यह रही कि ठाणे को छोड़कर बाकी सभी मानपाएं सचमुच भाजपा की झोली में डाल दी गईं! यह कोई राजनीतिक सौदा था या स्वाभिमान की बोली।
इसका जवाब आज भी मराठी मनुस तलाश रहा है। जिस शिवसेना को मां की तरह सहेजा गया था, उसे तोड़कर शिंदे ने क्या हासिल किया? मुख्यमंत्री पद? या फिर दिल्ली के दरबार में स्थायी हाजिरी? शिंदे को वोट देने वालों को अब तो अपनी आंखें खोलनी चाहिए, क्योंकि इतिहास एक ही बात कहता है कि जो अपने ही घर का दरवाजा तोड़ता है, वह अंत में परायों की ओसरी में बैठता है। मुंबई सिर्फ एक शहर नहीं है, बल्कि वह देश की आर्थिक राजधानी है। मुंबई के दुश्मनों की उसकी, ९२ हजार करोड़ की जमा पूंजी और ६६ हजार करोड़ के वार्षिक बजट पर नजर थी। इसके लिए उनके द्वारा साम का इस्तेमाल किया गया, दाम लुटाए गए, दंड दिखाया गया और भेद पैदा किया गया। इस सब के बल पर पार्टी तोड़ी गई, चिन्ह चुराया गया, ५० विधायक, ९ सांसद, ५० स्थाई नगरसेवक लालच देकर तोड़े गए। फिर भी अपेक्षित सफलता नहीं मिली। जिन ठाकरे बंधुओं को खत्म करने निकले थे, उनका नामोनिशान मिटाना तो दूर, वे और भी मजबूती से खड़े हो गए। ७६ सीटें जीतकर उन्होंने एक ही नारा दिया कि ‘टाइगर अभी जिंदा है!’ मराठी मानुस ने एक बार फिर ठाकरे परिवार का साथ दिया। सत्ता चली गई, लेकिन विश्वास कायम रहा। आज भी बेहिसाब पैसे का लालच दिखाने के बावजूद मराठी मानुस ठाकरे ब्रांड के साथ खड़ा है, क्योंकि सत्ता खरीदी जा सकती है, लेकिन अस्मिता नहीं। ठाकरे बंधु हारे नहीं हैं। वे महाराष्ट्र की जनता के दिलों में जीते हैं। और अंत में एक ही चेतावनी है कि अगर आज मशाल के पीछे खड़े नहीं हुए, तो कल दिल्ली के गुलाम बनने में देर नहीं लगेगी।
इतिहास माफ नहीं करता, वह सिर्फ दर्ज करता है कि कौन सत्ता के साथ था और कौन सत्य के साथ।

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