राजन पारकर
मतदाता घर में, नोटा मुंह पर पट्टी और २० लोग सीधे स्वर्ग? कल्याण-डोंबिवली में लोकतंत्र का एक नया प्रयोग चल रहा है। यहां मतदाता को वोट डालने की जरूरत नहीं है, मतपेटी खोलने की जरूरत नहीं है, यहां तक कि ईवीएम को छूने की भी जरूरत नहीं है – फिर भी निर्वाचित होना तय है! इसे चुनाव कहा जाए या नियुक्ति? इसे जीत कहा जाए या वरदहस्त? और मतदाता किससे पूछें? नोटा तो है… लेकिन बोलने की इजाजत नहीं है! २०१३ में, सुप्रीम कोर्ट ने मतदाताओं के हाथों में नोटा सौंप दिया। बेशक, ‘इसमें कोई भी नहीं!’ कहने का संवैधानिक अधिकार तो है ही। लेकिन केडीएमसी में क्या हुआ? एक ही उम्मीदवार और नोटा? वो तो बस दरवाजे पर खड़ी रही! मतदान ही नहीं तो मना कहां करें? मतदाता कहते हैं, ‘मुझे ये नहीं चाहिए।’ प्रशासन पूछता है, ‘तुम कौन हो? यह लोकतंत्र नहीं है यह तो लोकतंत्र का-सीधे डीलिट फाईल है! लोकतंत्र की कीमत ५० लाख और नैतिकता की कीमत १ करोड़ है, सीधे और तीखे हैं शिवसेना ठाकरे गुट के ये आरोप। विपक्ष के आवेदनों को वापस लेने के लिए कुछ लोगों को फोन आते हैं, कुछ पर दबाव डाला जाता है और कुछ को ५० लाख रुपए की ‘देशभक्ति’ का लालच दिया जाता है! क्या लोकतंत्र में वोट बेचना के लिए होता है? या उम्मीदवारी वापस लेने के लिए होती है? अगर यह सच है, तो केडीएमसी में चुनाव हुए ही नहीं बल्कि नीलामी हुई!
२० उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित… लेकिन विवाद सबके खिलाफ है! भाजपा-शिंदेसेना का कहना है ‘२० उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित।’ लोग पूछते हैं, ‘बिना किसी विरोध के? मतदाताओं के या कानून के?’ क्योंकि कानून कहता है कि चुनाव प्रक्रिया पूरी होने तक कोई भी खुद को विजेता घोषित नहीं कर सकता। तो ये जीत कहां से मिली? किसी प्रेस विज्ञप्ति से? या आशीर्वाद से? अगर नोटा जीत जाता है तो… ६ साल की जेल! तो ये २० लोग कहां जाएंगे? अगर अदालत कहती है ‘मतदान करो!’ और नोटा को उम्मीदवार से ज्यादा वोट मिलते हैं, तो उस उम्मीदवार पर ६ साल का प्रतिबंध लगाने की मांग होगी! तो सवाल यह है कि क्या आज जश्न मनाने वाले कल अयोग्य घोषित हो जाएंगे? क्या आज के विजेताओं पर कल लोकतंत्र का उल्लंघन करने का आरोप लगेगा? क्या गोल-माल है? क्या लोकतंत्र की ‘निर्विरोध’ मृत्यु हो गई है? यह सवाल सिर्फ २० वार्डों के बारे में नहीं है। सवाल यह है कि क्या वहां मतदाता हैं या नहीं। क्या नोटा अधिकार है या नहीं? क्या चुनाव एक प्रक्रिया है या एक तमाशा? अगर निर्विरोध का अर्थ मतदान न होना है, तो क्या कल संसद में ‘केवल एक ही उम्मीदवार है’ कहकर देश चलाएंगे? ‘लोकतंत्र जनता की आवाज है और यहां, जनता को म्यूट कर राजनेताओं ने खुद को विजयी घोषित कर दिया है!’ आज कल्याण-डोंबिवली में सवाल यह नहीं है कि कौन जीता? असली सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र हार गया है।
