शीतल अवस्थी
सावन के महीने में भगवान भोलेनाथ की विधि-विधान से की गई पूजा मनचाहा फल देती है। पूरे माह व्रत का नीति-नियम से पालन करने से पूरे वर्ष व्रत करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। ऐसी मान्यता है कि इस महीने में यदि भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों के दर्शन किए जाएं तो जन्म-जन्मांतर के कष्ट दूर हो जाते हैं। सावन में नियम से व्रतों का पालन करने से सुख, समृद्धि तो मिलती ही है साथ ही इससे शारीरिक और मानसिक पापों का नाश भी हो जाता है। सावन का महीना शिवभक्तों के लिए खास होता है। सावन में ज्योतिर्लिंगों व शिवालयों में विशेष पूजन किया जाता है। शिवभक्त कड़ाई से नियमों का पालन करते हैं। महादेव को प्रसन्न करने के लिए कोई महीने भर नंगे पांव रहता है, तो कोई पूरे सावन भर अपने केश नहीं कटाता। कोई दिन में एक बार भोजन करता है तो कोई केवल फलाहार पर ही दिन काट लेता है। आम तौर पर सभी इस दौरान मांस-मदिरा का त्याग कर देते हैं। सावन चातुर्मास के चार महीनों में बहुत शुभ माह माना जाता है। चातुर्मास धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्व रखता है। इसके चारों माह सावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक में धर्म-कर्म और अध्यात्म का बेहद महत्व है। सावन में शिवभक्त कांवड़ियों में जल लेकर शिवधाम की ओर निकल पड़ते हैं। शिवालयों में जल चढ़ाने के लिए लोग ‘बोल बम’ के नारे लगाते घरों से निकलते हैं। भक्त भगवा वस्त्र धारण कर शिवालयों की ओर कूच करते हैं। अधिकांश शिवभक्तों की इच्छा किसी न किसी ज्योतिर्लिंग पर जाकर जलाभिषेक करने की होती है। यही वजह है कि सावन के पावन महीने में शिव के सभी १२ ज्योतिर्लिंगों पर भोलेबाबा की जयकार गूंजती रहती है। फलस्वरूप इस समय हिंदुस्थान के सभी १२ ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। सावन के इस पवित्र महीने में इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन से अपार पुण्य लाभ मिलता है।
सोमनाथ
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग हिंदुस्थान का ही नहीं अपितु इस पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह ज्योतिर्लिंग गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। मान्यता है कि जब चंद्रमा को दक्ष प्रजापति ने श्राप दिया था तब चंद्रमा ने इसी स्थान पर तप कर श्राप से मुक्ति पाई थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं चंद्रदेव ने की थी। विदेशी आक्रमणों के कारण यह १७ बार नष्ट हो चुका है। हर बार यह बिगड़ता और बनता रहा है।
मल्लिकार्जुन
यह ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्री शैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। हिंदुस्थान के अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं। कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जहां पर यह ज्योतिर्लिंग है, उस पर्वत पर आकर शिव का पूजन करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होते हैं।
महाकालेश्वर
यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी कही जाने वाली उज्जैन नगरी में स्थित है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता यह है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है। महाकालेश्वर की पूजा विशेष रूप से आयु वृद्धि और आयु पर आए संकट को टालने के लिए की जाती है। उज्जैनवासी मानते हैं कि भगवान महाकालेश्वर ही उनके राजा हैं और वे ही उज्जैन की रक्षा कर रहे हैं।
ओंकारेश्वर
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर में स्थित है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ॐ का आकार बनता है। ॐ शब्द की उत्पति ब्रह्मा के मुख से हुई है इसलिए धार्मिक शास्त्रों या वेदों का पाठ ॐ के साथ ही किया जाता है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ॐ का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे औंकारेश्वर नाम से जाना जाता है।
केदारनाथ
केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग भी भगवान शिव के प्रिय ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड में स्थित है। बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है। केदारनाथ समुद्र तल से ३५८४ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कंद पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है, जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिवजी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है।
भीमाशंकर
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग पूणे जिले में सहाद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रद्वा से इस ज्योतिर्लिंग का प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर होते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं।
काशी विश्वनाथ
विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग हिंदुस्थान के १२ ज्योतिर्लिंगों में से प्रमुख है। यह उत्तर प्रदेश के काशी में स्थित है। सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है। इस स्थान की मान्यता है कि यह स्थान्ा सदैव बना रहेगा अगर कभी पृथ्वी पर किसी तरह का कोई प्रलय आता भी है तो इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने पर काशी को इसके स्थान पर रख देंगे।
त्र्यंबकेश्वर
यह ज्योतिर्लिंग गोदावरी नदी के करीब नाशिक जिले में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरू होती हैं। भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में रहना पड़ा।
वैद्यनाथ
श्री वैद्यनाथ शिवलिंग का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मंदिर जिस स्थान पर अवस्थित है, उसे वैद्यनाथधाम कहा जाता है। यह स्थान झारखंड प्रांत, पूर्व में बिहार प्रांत के संथाल परगना के दुमका नामक जनपद में पड़ता है।
नागेश्वर
यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में स्थित है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता हैं और नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है। द्वारका पुरी से भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी १७ मील की है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा गया है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शन के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
रामेश्वरम
यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरं जिले में स्थित है। भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ यह स्थान हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम का नाम रामेश्वरम दिया गया है।
घृष्णेश्वर
घृष्णेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के संभाजीनगर शहर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे घृष्णेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। भगवान शिव के १२ ज्योतिर्लिंगों में यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं इस मंदिर के समीप स्थित हैं। यहीं पर श्री एकनाथजी गुरु व श्री जनार्दन महाराज की समाधि भी है।
