मुख्यपृष्ठस्तंभहनीफनामा : बचपन के यारों का करिश्मा

हनीफनामा : बचपन के यारों का करिश्मा

हनीफ जवेरी

किसी के काम से प्रेरित होकर कुछ नया रचना आम बात है और ऐसा हमारी फिल्म इंडस्ट्री में बरसों से देखने को मिलता आया है, जहां एक मेकर या म्यूजिक कम्पोजर दूसरे के काम से प्रभावित होकर कुछ नया बनाने की कोशिश कर सफलता प्राप्त करता है।
१९४१ की फिल्म ‘झूला’ के सेट पर अकसर हीरो अशोक कुमार के छोटे भाई किशोर कुमार, डांस मास्टर मुमताज अली के बेटे महमूद और डायरेक्टर ज्ञान मुखर्जी के भतीजे ज्योति स्वरूप अपनी कम उम्र के कारण साथ खेला करते थे।
उन्हीं दिनों कवि प्रदीप का लिखा और म्यूजिक कम्पोजर सरस्वती देवी का एक गाना अशोक कुमार की आवाज में उन्हीं पर फिल्माया जा रहा था, जिसके बोल थे, ‘एक चतुर नार करके सिंगार…’ यह गाना अक्सर ये तीनों ८–१० साल के बच्चे गुनगुनाया करते। इन तीनों की दोस्ती चाइल्ड आर्टिस्ट बेबी मुमताज से भी थी, जिनके साथ ये ‘पैâमिली-पैâमिली’ का खेल खेलते। बेबी मुमताज इस खेल में कभी किशोर की पत्नी बनतीं तो कभी महमूद की।
इन बच्चों के बीच खेल के दौरान झगड़े भी होते और ‘कुट्टी-दोस्ती’ का सिलसिला भी चलता रहता। अब वक्त के साथ ये चारों बच्चे बड़े हुए। बेबी मुमताज जानी-मानी अभिनेत्री के तौर पर मधुबाला के नाम से लोकप्रिय हुर्इं, किशोर कुमार अभिनेता-गायक और महमूद प्रसिद्ध कॉमेडियन के रूप में मशहूर हुए। यह भी अजीब इत्तेफाक रहा कि बचपन में जो मधुबाला पैâमिली खेल में किशोर कुमार की पत्नी बना करती थीं, वही आगे चलकर किशोर कुमार की दूसरी पत्नी बनकर अपना घर-गृहस्थी बसाने लगीं। करियर तो साथ खेल-कूदकर बड़े हुए सभी बच्चों का बन गया था, बस ज्योति स्वरूप का करियर बनना बाकी था। वह अपने मामा ज्ञान मुखर्जी के असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में कई फिल्में कर चुके थे और अब महमूद ने उनका करियर बनाने का फैसला किया।
एन. सी. सिप्पी और महमूद की फिल्म ‘साधु और शैतान’ अभी निर्माणाधीन ही थी कि दोनों को एक और हास्य फिल्म बनाने का विचार आया। तमिल फिल्म `अदुथा वीट्टु पेन’ से प्रभावित होकर उन्होंने ‘पड़ोसन’ की योजना बनाई। तब महमूद को लगा कि अब अपने बचपन के मित्र ज्योति स्वरूप को स्वतंत्र निर्देशक के रूप में अवसर देना चाहिए। उन्होंने निर्देशन की जिम्मेदारी ज्योति स्वरूप को सौंप दी। फिर दोनों बचपन के साथी अपने तीसरे मित्र किशोर कुमार को भी इस फिल्म में शामिल कर लिया। वे चाहते थे कि किशोर कुमार की पत्नी और उनकी बचपन की मित्र मधुबाला फिल्म में दिखाई दें, पर उस समय मधुबाला की तबीयत बहुत खराब थी। इसलिए तीनों ने मिलकर उन्हें न लेने का निर्णय किया। हालांकि, यह तय हुआ कि ‘पड़ोसन’ की नायिका अत्यंत सुंदर होनी चाहिए और उस समय सायरा बानो से अधिक सुंदर कोई अन्य नायिका नहीं मानी जाती थी। इसलिए महमूद ने सायरा बानो को फिल्म के लिए अनुबंधित कर लिया।
फिल्म ‘पड़ोसन’ की शूटिंग चल ही रही थी कि एक दृश्य में जुगलबंदी गीत की जरूरत महसूस हुई। तब तीनों मित्र-ज्योति स्वरूप, महमूद और किशोर को फिल्म ‘झूला’ का वो गीत याद आया, जो उन्होंने बचपन में गुनगुनाया था और गीतकार राजेंद्र कृषन से कहा कि इसी आधार पर आगे की पंक्तियां लिखकर जुगलबंदी गीत तैयार करें। पहली पंक्ति की धुन को छोड़कर पूरा गीत आर.डी.बर्मन ने नई धुन में तैयार किया। इस प्रकार ‘झूला’ के गीत से प्रेरणा लेकर इन बचपन के साथियों ने ऐसा अमर गीत रचा जो आज भी उतना ही लोकप्रिय है। हालांकि, शुरू में गायक मन्ना डे यह गीत रिकॉर्ड करने के पक्ष में नहीं थे। उन्हें लगा कि उनके जैसे ऊंचे दर्जे के गायक को किशोर कुमार के सामने जुगलबंदी में कैसे हराया जा सकता है? लेकिन महमूद ने उन्हें समझाया कि उनका हारना जरूरी है, क्योंकि कथा की मांग यही है, जहां महमूद का हारना आवश्यक है। यह सुनकर मन्ना डे गीत रिकॉर्ड करने के लिए तैयार हो गए।

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