सामना संवाददाता / भायंदर
मीरा-भायंदर शहर पिछले कुछ वर्षों में लगातार ऐसी घटनाओं के कारण चर्चा में बना हुआ है, जिनमें दो समुदायों के बीच तनाव की स्थिति पैदा होती रही है। सामान्य स्तर पर सुलझाए जाने योग्य विवाद को जब राजनीतिक रंग मिलता है, तब स्थिति और गंभीर हो जाती है। इसी प्रवृत्ति ने शहर को नफरत की राजनीति का नया मैदान बना दिया है। जेपी इंप्रâा का बकरा विवाद, नवरात्रि के दौरान अंडा फेंकने का मामला या फिर हाल ही में रिक्शाचालकों और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के बीच हुई झड़प, ऐसे अनेक उदाहरण सामने आते रहे हैं। किसी भी शहर में इस प्रकार की छोटी-मोटी घटनाएं समय-समय पर घटित होती हैं और पुलिस विभाग अपनी प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई करता है। वास्तविक समस्या तब उत्पन्न होती है, जब राजनीतिक हस्तक्षेप अनावश्यक रूप से बढ़ जाता है। मीरा-भायंदर में कई विवादों के दौरान देखा गया है कि विभिन्न दलों के नेता घटनास्थल पर पहुंचकर बयानबाजी के माध्यम से माहौल को अधिक उत्तेजक बना देते हैं। भाजपा के किरीट सोमैया और नितेश राणे तथा एआईएमआईएम के वारिस पठान जैसे नेता अक्सर इन मुद्दों में सक्रिय दिखाई देते हैं। उनके आगमन के बाद कथित रूप से दोनों पक्षों में तनाव बढ़ता है और पुलिस के सामने संतुलन बनाए रखने की चुनौती और कठिन हो जाती है। रिक्शाचालकों और धार्मिक संगठन के कार्यकर्ताओं के बीच उत्पन्न हालिया विवाद इसका ताजा उदाहरण है। इस प्रकरण के पश्चात अलग-अलग दिनों में राजनीतिक नेताओं की मौजूदगी दर्ज हुई। उन्होंने पुलिस उपायुक्त से मुलाकात की और अपने-अपने पक्ष की वकालत की। ऐसे अवसरों पर बड़ी संख्या में समर्थकों की भीड़ पुलिस कार्यालय के बाहर एकत्रित हो जाती है, नारेबाजी होती है और स्थिति तनावपूर्ण बन जाती है। यह वातावरण पुलिस प्रशासन पर अनावश्यक दबाव पैदा करता है तथा कानून-व्यवस्था को संभालने का जोखिम बढ़ा देता है। स्थानीय नागरिक और सामाजिक संगठन इस स्थिति को लेकर चिंतित हैं। उनका कहना है कि शहर में सामान्य विवादों को राजनीतिक फायदा उठाने का जरिया बना दिया गया है। विकास, बुनियादी सुविधाएं और नागरिक मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं, जबकि शहर को नकारात्मक छवि वाली घटनाओं के लिए पहचाना जाने लगा है।
