बेटियां 

बात करूं यदि मैं बेटियों की,
ये परिजनों के दिल में राज करती हैं।
बढ़ता कद देख बेटियों का, पिता कहते हैं,
कैसे इनको मैं अपने से दूर करूं?
क्योंकर मैं इन्हें विवाह करने के लिए मजबूर करूं?
इनके बिना घर सूना, किस बात का मैं गुरूर करूं?
हे मेरे ‘परम पिता’, इनका ख्याल अब आप ही रखना,
पूरा हो मेरी बेटियों का हर सपना।
‘ससुराल’ में भी इन्हें सकुशल, प्रसन्न रखना।
सास-ससुर, जेठ-जेठानी, ननद-देवर,
सभी लगें इनको मायके समान अपना।
इनसे लगाव हो इतना कि
बेटी समान वे ‘बहू’ को समझें अपना।
बेटियां हरदम मन को भाएं,
कभी न इनकी मुस्कान मुरझाए।
खुशियों से इनका दामन भर देना।
बाबुल की बस यही दुआ है,
मायके सा, ससुराल में भी तुम प्यार बरसना।
बेटियां वो होती हैं, जो ‘बहू’ बनकर
‘दोहरे किरदार वाली जिम्मेदारियां’ निभाती हैं।
बदले में बेटियां ‘दोहरा प्यार’ पाती हैं।

-त्रिलोचन सिंह अरोरा 

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