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जेब पर भारी पड़ रही है बीमारी … निजी अस्पतालों में इलाज खर्च १० गुना बढ़ा!

जेदवी / मुंबई
निजी अस्पतालों में इलाज अब धीरे-धीरे आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है। सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमजोर होती हालत और निजी अस्पतालों की बेलगाम फीस ने मरीजों की कमर तोड़ दी है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की स्वास्थ्य सर्वेक्षण रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि पिछले तीन दशकों में निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च लगभग १० गुना बढ़ गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष १९९५-९६ में निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों पर औसतन ४,८२२ रुपए खर्च होते थे, जो २०२५ में बढ़कर करीब ५० हजार रुपए तक पहुंच गया है। यानी बीमारी अब सिर्फ शरीर ही नहीं, जेब पर भी भारी पड़ रही है। हालांकि, सरकारी अस्पतालों में भी इलाज का खर्च बढ़ा है। १९९५-९६ में जहां सरकारी अस्पतालों में औसत खर्च करीब २ हजार रुपए था, वहीं अब यह बढ़कर ६ हजार रुपए से ज्यादा हो गया है, लेकिन निजी अस्पतालों की तुलना में यह बढ़ोतरी कहीं ज्यादा डराने वाली मानी जा रही है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि ग्रामीण इलाकों में रहने वाले गरीब परिवारों पर इलाज का बोझ सबसे ज्यादा बढ़ा है। गांवों में निजी अस्पतालों का खर्च कई परिवारों को कर्ज और आर्थिक संकट की तरफ धकेल रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण का असर अब सीधे आम जनता की जिंदगी पर दिखाई देने लगा है। चिंता की बात यह भी है कि भारत में लोगों को अपनी जेब से स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च अब भी दुनिया के कई देशों की तुलना में ज्यादा उठाना पड़ रहा है।
सरकारी स्वास्थ्य सुरक्षा योजनाओं से राहत नहीं
रिपोर्ट के अनुसार, स्वास्थ्य खर्च में लोगों की जेब से होने वाला हिस्सा अब भी काफी ऊंचा बना हुआ है, जिससे साफ है कि सरकारी स्वास्थ्य सुरक्षा योजनाएं अभी भी आम नागरिकों को पूरी राहत नहीं दे पा रही हैं। रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि देश में स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च कम करने और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की सख्त जरूरत है। बीमारी का डर अब सिर्फ जान का नहीं, बल्कि घर की आर्थिक हालत बिगड़ने का भी बन चुका है। इलाज की बढ़ती कीमतों ने मध्यम वर्ग और गरीबों के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

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