मनमोहन सिंह
यूं ही नहीं ‘विश्व भुखमरी सूचकांक’ में भारत बेहद छोटे और गरीब देशों से भी पीछे चला गया है। २०१९-२१ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश की जनसंख्या का १६.३ फीसदी हिस्सा कुपोषित है। यहां पांच साल से कम उम्र के ३५.५ फीसदी बच्चों की लंबाई उनके उम्र के हिसाब से कम है, १८.७ फीसदी ऐसे हैं, जिनका वजन बेहद कम है क्योंकि उन्हें पर्याप्त आहार नहीं मिलता है। २.९ फीसदी बच्चे तो पांच साल पूरा होने से पहले ही मर जाते हैं। वैसे तो असल तस्वीर इन आंकड़ों से भी ज्यादा बुरी है, लेकिन मोदी सरकार तमाम ऐसे आंकड़ों और तथ्यों को भी झुठलाने का काम करती है। भारत दुनिया के उन ४२ देशों की सूची में आता है, जिनमें कुपोषण की स्थिति अतिगंभीर है। नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश की स्थिति भी ‘विश्वगुरु’ से बेहतर है।
मोदी सरकार के पिछले ११ साल के कार्यकाल में स्थिति और अधिक खराब हुई है। बढ़ते कुपोषण और भुखमरी को देखते हुए जब जरूरत थी कि बच्चों और लोगों तक बेहतर आहार पहुंचाने का काम सुनिश्चित किया जाए, मिड-डे-मील जैसी स्कीम व अन्य सामाजिक कल्याण की स्कीमों के बजट को बढ़ाया जाए, तब सरकार ठीक इसके विपरीत काम करते हुए नजर आ रही है। सरकारी स्कूलों के बंद होने और बच्चों की पहुंच से मिड-डे-मील दूर होने का सीधा प्रभाव उनकी शिक्षा पर पड़ेगा।
कहने के लिए सरकार शिक्षा को हर किसी का अधिकार बताती है, लेकिन असलियत इससे कोसों दूर है। पढ़ाई-लिखाई भी आज उन लोगों की जागीर बन कर रह गई है, जिनके पास पैसा है। सरकारी शिक्षा तंत्र को बर्बाद कर दिया गया है, जिसकी वजह से गरीब आबादी से आने वाले बच्चे शिक्षा से दूर होते जा रहे हैं। मिड-डे-मील में कमी और सरकारी स्कूलों के बंद होने का असर बच्चों के साथ-साथ इस स्कीम के तहत काम करने वाले वर्कर्स पर भी पड़ेगा। देश में २६ लाख मिड-डे मील वर्कर्स हैं, जिनकी नौकरियां भी खतरे में हैं। कहीं यह बेहतर पोषण और शिक्षा के बुनियादी अधिकार को आम आबादी के बच्चों से छीनने की तैयारी तो नहीं है?
सवाल सही भी है। क्योंकि यह कोई कोरी गप नहीं, बल्कि सरकार के मुख से निकला हुआ सच है। बीते दिनों संसद में शिक्षा मंत्री जयंत चौधरी द्वारा दिए गए आंकड़े तो चौंकाने वाले हैं। २०२१-२२ तक इस योजना के तहत ११.१९ लाख स्कूल आते थे, जो २०२४-२५ में घटकर १०.३५ लाख रह गए हैं यानी ५ सालों में ७.५ प्रतिशत स्कूल कम हो गए। ८४,४५३ स्कूल मिड-डे-मील योजना (पीएम-पोषण योजना) से बाहर हो गए हैं।
देश में सरकारी स्कूलों की कुल संख्या में भी कमी आई है। २०२०-२१ में १०.३२ लाख स्कूल थे, जो २०२४-२५ में घटकर १०.१३ लाख हो गए, यानी इस बीच १८,७२७ सरकारी स्कूल बंद हो गए। २०१४ से २०२४ के बीच देश में कुल ८९,००० स्कूल बंद हो चुके हैं।
भाजपा-शासित राज्यों में पीएम-पोषण योजना से बाहर होने वाले स्कूल सबसे अधिक हैं। उत्तर प्रदेश में जहां २०२०-२१ में इस स्कीम के तहत आने वाले स्कूलों की संख्या १.६ लाख थी, वहीं २०२४-२५ में यह घटकर १.४ लाख हो गई। सिर्फ यूपी में पांच सालों के दौरान तकरीबन २५,३६१ स्कूल और इनमें पढ़ने वाले लाखों बच्चे पोषण योजना के लाभ से बाहर हो गए। मध्य प्रदेश में इन पांच सालों में स्कूलों की संख्या १.१ लाख से घटकर ८८,००० के आसपास रह गई। असम में भी ९,३२१ स्कूलों में मिड-डे-मील मिलना बंद हो गया।
अब तक इस योजना के तहत देशभर के १०-११ लाख स्कूलों में औसतन ८-९ करोड़ बच्चों को एक वक्त का भोजन मिल रहा था। सरकार द्वारा चलाई जा रही यह योजना पहले ही अपर्याप्त थी, लेकिन अब वह भी धीरे-धीरे खत्म हो रही है। जब शिक्षा मंत्री से सवाल किया गया तो उन्होंने बहुत बेशर्मी से यह कहकर टाल दिया कि ‘इस स्कीम के तहत बच्चों को खाना देने की पूरी जिम्मेदारी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की है।’
सवाल बनता है कि ‘डबल इंजन’ की सरकार होने के बावजूद भी क्यों लगातार लाखों बच्चों की पहुंच से मिड-डे-मील दूर होता जा रहा है? उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और असम में तो राज्य सरकार भी भाजपा की है फिर जिम्मेदारी किसकी बनती है?
