मनमोहन सिंह
मध्य प्रदेश के कहानीकार हैं मनोज रूपड़ा। उनके साथ कुलपति महोदय ने जो अशोभनीय व्यवहार किया उससे पूरा सोशल मीडिया गूंज रहा है। कहा जाता है कि गुजराती पृष्ठभूमि और संपर्कों के माध्यम से कुलपति बने हैं कथित साहित्यकार प्रोफेसर आलोक कुमार चक्रवाल।
मेरे मित्र हैं विजय चतुर्वेदी वे भी इससे बुरी तरह आहत हैं और आहत होना बनता भी है। उन्हीं के शब्दों में… ‘मनोज रूपड़ा के साथ गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर के कुलपति ने जो व्यवहार किया, उसे यूट्यूब पर देखा और बेहद क्षुब्ध हूं। इस पर अनेक मित्रों ने अपना आक्रोश व्यक्त किया है, जिसे समझ सकता हूं। मैंने किसी के द्वारा लगाई गई अखबारी कतरन भी देखी, जिसमें कुलपति का कहानी पर दिया गया भाषण तो है, लेकिन मनोज के साथ दुर्व्यवहार की कोई चर्चा नहीं है। यह पत्रकारिता के पतन का नमूना है।
अब मनोज मामले पर आया जाय। कुलपति ने भाषण के क्रम में कहा मैं आप लोगों को बोर तो नहीं कर रहा? आगे की पंक्ति में बैठे अतिथि लेखक मनोज रूपड़ा ने इतना भर कहा कि विषय पर बोला जाय। कुलपति कुपित हो गए। नाम पूछा। फिर कहा आप में वीसी से वैâसे बात की जाय इसका विवेक नहीं है। वीसी ने उपस्थित आयोजकों से यह भी पूछा कि किसने इन्हें बुलाया। फिर कहा आप बाहर जाइए। इनको कभी नहीं बुलाना है। आदि-आदि। वीसी का अंदाज एक गुंडे की तरह का था।
लेखकों की प्रतिष्ठा के मामलों का एक पुख्ता इतिहास है। कहते हैं मध्यकाल में कवि जायसी की धज पर तत्कालीन सुलतान ने हंसी लगाई थी, क्योंकि कवि कुरूप थे। जायसी चुप रहनेवाले नहीं थे। सुलतान से पूछा, `मुझ पर हंस रहे हो या मुझे बनाने वाले पर?’ सुलतान को वाजिब जवाब मिल गया था। कहते हैं उसने मुआफी मांगी।
गालिब के बारे में कहा जाता है कि वह दिल्ली कॉलेज में बुलावे पर शिक्षक के तौर पर गए, लेकिन वहां का प्रिंसिपल उनके स्वागत के लिए बाहर नहीं आया। वह गेट से ही लौट गए।
बहुतेरे किस्से होंगे, लेकिन एक किस्सा इसी जमाने का है। १९६७ का और यह करारा जवाब देने का है। तब मोरारजी देसाई उप प्रधानमंत्री थे। उन्होंने दिल्ली के कुछ लेखकों को चाय पर बुलाया था। लेखकों में मोहन राकेश भी थे। परिचय कराए जाने के बाद मोरारजी देसाई प्रवचन की मुद्रा में लेखकों को उपदेश देने लगे। अगली पंक्ति में बैठे मोहन राकेश ने जेब से सिगरेट निकाली और सुलगाकर कश लगार्इं। देसाई ने नाराजगी जताते हुए कहा, ‘राकेशजी, मैं बदतमीजी बर्दाश्त नहीं करता।’
मोहन राकेश ने छूटते ही जवाब दिया, ‘बदतमीजी कौन कर रहा है? मैं या आप? चाय पर बुलाकर भाषण पिला रहे हो। मैं बहिष्कार करता हूं’ और इतना कहकर वह बाहर निकल गए। यह होता है लेखक का साहस। इस घटना का जिक्र उनके निधन पर रघुवीर सहाय ने अपने लेख में (दिनमान) किया था।
एक दूसरी घटना १९७७ या ७८ की है। किशोरीदास वाजपेयी को कोई पुरस्कार दिया जाना था प्रधानमंत्री के हाथों। प्रधानमंत्री वही मोरारजी देसाई थे। वाजपेयी जी सभागार में अगली पंक्ति में बिठाए गए थे। पुरस्कार ग्रहण करने के लिए उन्हें मंच पर बुलाया गया। वे नहीं गए। उनका मानना था कि जिसे पुरस्कार देना है, वहां प्रदान करनेवाले को जाना चाहिए। संस्कृति का व्याकरण तो यही कहता है। प्रधानमंत्री ने बात ताड़ ली। वह मंच से नीचे उतरे। वाजपेयी जी के पास आए। वाजपेयी जी ने उठकर पुरस्कार ग्रहण किया। इस घटना पर रघुवीर सहाय ने दिनमान में संपादकीय अग्रलेख लिखा था।
चर्चा हुई तब महादेवी जी के अपमान का भी स्मरण हुआ। संभवत: १९८० की बात है। जयपुर में मंच पर राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री पहाड़िया जी थे। महादेवी वर्मा जी भी थीं। मुख्यमंत्री ने अपने भाषण में महादेवी जी पर कुछ अनाप-शनाप कह दिया। बात अखबारों में आई। इंदिरा गांधी तक पहुंची। इंदिरा जी कुछ ही समय पहले प्रधानमंत्री हुई थीं। मुख्यमंत्री को तुरंत हटा दिया गया। यह समय भी इस देश में ही था। इंदिरा गांधी ने अपनी राजनीति में संस्कृति का कोई शाइन बोर्ड नहीं लगाया हुआ था। आज सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का बैनर लगाए हुए लोग क्या एक बद्तमीज वीसी को हटाने की हिम्मत रखते हैं? है कोई पूछनेवाला?
(स्वाभिमानी रचनाकारों ने इसे हिंदी समाज की पूरी लेखकीय बिरादरी का अपमान बताकर राज्यपाल और राष्ट्रपति को पत्र भी भेजा है। अभी देखना बढ़िया होगा कि अच्छा होता क्या है क्योंकि बात प्रधानमंत्री महोदय तक पहुंची ही गई होगी)
