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शिलालेख : प्राचीन राष्ट्र है भारत

हृदयनारायण दीक्षित
लखनऊ

भारत प्राचीन राष्ट्र है। भारत केवल डेढ़ अरब लोगों का जोड़ नहीं। यह इतिहास और भूगोल का अंग ही नहीं है। मात्र एक देश भी नहीं है। यह एक वृहत्तर सांस्कृतिक अनुभूति है। एक शाश्वत संवेदनशील काव्य है। भारतीय संस्कृति हजारों वर्ष प्राचीन है। वैदिक काल और उसके पहले से ही यहां एक विशेष सांस्कृतिक परंपरा का प्रवाह है। ऋग्वेद दुनिया का प्राचीनतम ज्ञान गान है और आनंद वैदिक समाज का ध्येय है। इसमें आनंद प्राप्ति का आशावाद है। हिंदुत्व की शक्ति का मूल केंद्र अनुभूत दर्शन है। हिंदुत्व का प्राचीनतम आधार वेदों में प्रकट हुआ है और दर्शन की अभिव्यक्ति उपनिषदों में हुई है। उपनिषद दुनिया के दर्शनों का सार है। जानना, सुनना, सुने गए को स्मृति में संरक्षित करना और सुनाना उपनिषदों में व्रत कहा गया है। श्रुति और वेद पर्यायवाची हैं। शब्द रूप और ज्ञान का संरक्षण स्मृति है। सत्य और सुंदर को पुनर्सृजित करना संस्कृति है। भारतीय संस्कृति में निरंतरता है। इस निरंतरता का मूल हिंदुत्व है।
भारतीय संस्कृति का मूलाधार स्वयंसिद्ध दर्शन है। विचार-विमर्श में संशय का महत्व है। संशयी प्रत्यक्ष पर भी पूरा विश्वास नहीं करता। वह तर्क करता है। विश्वासी से संशयी बड़ा है। विश्वासी तृप्त है और संशयी बेचैन, अतृप्त। हिंदू जीवनशैली में अंधविश्वास को कोई जगह नहीं मिली। यहां विश्वासी और संशयी से भी बड़ा जीवन मूल्य है श्रद्धा। श्रद्धा और विश्वास में अंतर है। अस्तित्व के प्रति प्रेम का नाम है श्रद्धा। श्रद्धा साधारण प्रीति है। वैज्ञानिक ब्रह्मांड की संपूर्ण जानकारी के लिए प्रयासरत हैं। गैर जाने भाग के बारे में जानकारियां परिपूर्ण नहीं हैं। हमारी जानकारी इतनी ही है कि हम इसे नहीं जानते। लेकिन यह जानकारी भी पर्याप्त है। इससे शोध के प्रयास की तीव्रता बढ़ती है। अस्तित्व का इससे भी बड़ा भाग अज्ञेय है।
जाने हुए, जानने की सूची में आए हुए और बिना जाने भाग सहित संपूर्ण अस्तित्व के प्रति प्रीति का नाम है श्रद्धा। श्रद्धा, पंथ, मत, मजहब या रिलीजन के उपदेशों वाला विश्वास नहीं।
श्रद्धा अनुभूति है। बूंद के हृदय में सागर का साक्षात। क्षर में अक्षर का प्रत्यक्ष। सोचना साधारण मानसिक कार्रवाई है। हरेक मानसिक या बौद्धिक कार्रवाई का अंत ज्ञान है। ज्ञान का अवसान कर्म में होना चाहिए। कोरे शब्द ज्ञान का कोई मतलब नहीं। वैसे कर्म का अवसान भी ज्ञान में होता है। कर्म करते-करते सप्रयास या अनायास अंत:करण से ज्ञान की सुगंध उठती है। हम सब पर गंध आच्छादन होता है। अनायास कोई गीत उगता है। संगीत आता है। मेघ आते हैं, सब कुछ रसमय, गंधमादन और गीत-संगीत से भर जाता है। यह हुई श्रद्धा। संभव है कि अब तक ऐसा नहीं हुआ हो, लेकिन श्रद्धा है कि ऐसा हो सकता है किसी भी क्षण। होनी की धैर्यपूर्ण प्रतीक्षा भी श्रद्धा है। मेघ आएंगे ही, बादलों को क्यों कोसना? सूर्य उगेंगे ही, अंधेरे से क्या उलाहना। ऊषा आएगी ही, अंधकार से क्यों उलझना? सूर्य अरुण तरुण होकर हमें प्रकाश किरणों से नहलाएंगे ही अधीर क्यों होना? ऐसी आश्वस्त प्रतीक्षा श्रद्धा है। हिंदू जीवन शैली में श्रद्धा आनंद आश्वस्ति है।
भारतीय इतिहास का उत्तर वैदिक काल अग्निधर्मा था। ज्ञान ताप से तपे उपनिषदों के मंत्र इसी समय उगे। इसी साहित्य के एक आनंदवर्द्धन मंत्र में ‘श्रद्धा’ को पत्नी और सत्य को यजमान कहा गया है- श्रद्धा पत्नी सत्यं यजमान:। यज्ञ में पति-पत्नी साथ बैठते थे। यज्ञ के आयोजक यजमान कहे जाते थे। पत्नी के बिना पारंपरिक कर्मकांड पूरे नही होते। इस मंत्र में ‘सत्य’ यजमान है। वैदिक अनुभूति में अस्तित्व की पूरी गतिविधि भी यज्ञ है। विज्ञान, दर्शन, योग या शोध का उद्देश्य ‘सत्य’ प्राप्ति है। यहां सत्य ही आनंद है। मंत्र का दूसरा भाग बड़ा रोमांचकारी है- ‘श्रद्धा सत्यं तत् अत्युतमं मिथुनं। पत्नी श्रद्धा और यजमान सत्य का प्रेमपूर्ण मिलन अति उत्तम है। इसी मिलन से आनंद लोक मिलते हैं।’
श्रद्धा और सत्य की प्रीति अजर-अमर है। सत्य मिला तो श्रद्धा भी मिली। श्रद्धा आई, प्रगाढ़ हुई, संपूर्ण हुई तो सत्य की लब्धि। सत्य श्रद्धाहीन नहीं हो सकता। श्रद्धा सत्यविहीन नहीं हो सकती। सत्यहीन श्रद्धा अंधविश्वास है। बिना जाने, देखे, समझे और अनुभव रस के अभाव के बावजूद मान लेना श्रद्धा नहीं है। लोकजीवन में वरिष्ठों के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए अनेक शब्द हैं। ‘श्रीमान’ कहने का अपना सुख है। मान्यवर या माननीय में मानने की ध्वनि है। इसमें बिना जाने ही मान लेने की चूक जान पड़ती है। जनप्रतिनिधियों को ‘माननीय’ कहते हैं। कर्मकांड की तरह यों ही। बड़ों के प्रति आदर की सबसे गहरी अभिव्यक्ति है- श्रद्धेय।
श्रद्धेय बड़ा श्रद्धेय शब्द है। यह सुनने वाले ‘श्रद्धेय’ को संकोची बनाता है और कहनेवाले को विनयी। भौतिकवादी श्रद्धा को अंधविश्वास बताते हैं। कुछेक इसे भाववाद तक ले जाते हैं। ‘श्रद्धा’ मनोभाव नहीं है। ऋग्वेद में श्रद्धा भी एक देवता हैं। कहते हैं ‘श्रद्धा से ही अग्नि प्रज्वलन होता है। श्रद्धा से ही आहुति समर्पण होता है।’ यहां श्रद्धा विभूतियों का शिखर हैं- श्रद्धां भगस्य मूर्धनि। ऋषि उनका अनेकश: आवाहन करते हैं ‘हम प्रात: मध्याह्न और प्रात: संध्या श्रद्धा का आवाहन करते हैं। वे श्रद्धा हमें परिपूर्ण श्रद्धा दें। श्रद्धे श्रद्धाययेह न:।’ श्रद्धा में ज्ञान और प्रेम दोनों हैं। बुद्धि और हृदय की युति है। विश्वास के साथ सत्य भी है। यह हिंदू अनुभूति है।
श्रद्धा प्रतीक्षा है। असंशयी प्रतीक्षा। तैत्तिरीय ब्राह्मण में उन्हें प्राकृतिक शक्ति की पुत्री बताया गया है। उन्हें ‘सूर्यदुहिता’ भी कहा गया है। संशय ज्ञान यात्रा में सहायक है। संशय को दूर करने के लिए तर्क, प्रतितर्क, आचार्य और विज्ञान के उपकरण हैं। ज्ञान या अनुभूति की कोई भी यात्रा शून्य से नहीं शुरू होती। प्रकृति भी शून्य से नहीं उगी। हम इंद्रियबोध के माध्यम से संसार से जुड़ते हैं। क्या आंख पर संशय कर सकते हैं? क्या कान, नाक, स्वाद या स्पर्श पर भी? तब प्रारंभ कहां से करें? स्वयं की बुद्धि भी इंद्रियबोध का ही परिणाम है। स्वयं की बुद्धि पर भी संशय हो तो क्या करेंगे? तीन उपकरण बताए गए हैं- प्रमाण, अनुमान और अनुभूत शब्द। प्रमाण अनुमान इंद्रियबोध से जुड़े हैं। विद्वानों के शब्द श्रद्धा से। श्रद्धा हिंदू जीवन सारिणी में श्रेय है।
श्रद्धा गहन आत्मविश्वास का पर्याय है। अंधकार स्थायी नहीं है। सूर्य स्थायी है। वे कोहरे में भी होते हैं। समाजचेता का उत्तरदायित्व अंधकार का अस्थायित्व बताना और सूर्य तेजस के सतत प्रवाह का विवरण देना है। निराशा, हताशा नहीं आशा और उत्साह का वातावरण बनाना है। पराजय नहीं उल्लास का भाव। जीवन के कृष्णपक्ष ही नहीं, शुभ्र पक्ष की चर्चा भी होनी चाहिए। प्रकृति सृष्टि के प्रति ‘श्रद्धा’ भाव को पुष्ट करना जरूरी है। यही हिंदुत्व में कर्तव्य है।
(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)

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