मुख्यपृष्ठस्तंभशिलालेख: मन के जाल में कैद इंसान

शिलालेख: मन के जाल में कैद इंसान

हृदयनारायण दीक्षित 

फ्रायड ने साहित्य रचना में अतृप्त चित्त की भूमिका को ही महत्वपूर्ण माना है। कहा है कि अतृप्त चित्त कल्पना चित्र-फैंटेसी गढ़ता है। फ्रायड के दृष्टिकोण में `फैंटेसी’ का अर्थ है, अतृप्त चित्त का सृजन कर्म। उनके लिखे सारे गीत फैंटेसी हैं। फैंटेसी का सामान्य अनुवाद होगा- हमारा स्वप्न। सिनेमा के गीत का संकेत है। हमारे सपनों की रानी। स्वप्न यथार्थ होते नहीं। वे मोहक होते हैं तो सुंदर और डरावने होते हैं तो वीभत्स। लेकिन मन-मोहक और वीभत्स दोनों ही किस्म के स्वप्नों का यथार्थ ‘डर्टी पिक्चर्स’ ही होता है। जागृत समाज मधुमय होते हैं, उनकी अतृप्ति में मधुप्यास होती है और तृप्ति में मधु संतुष्टि। `फैंटेसी’ शब्द का इस्तेमाल फ्रायड ने अपने ‘अतृप्त मन’ के सिद्धांत में दिवास्वप्न के लिए ही किया है। लेकिन फैंटेसी खतरनाक भी है। इसी का पड़ोसी शब्द है-फैनटीसिज्म। इसका अर्थ है पंथिक दुराग्रह। भौतिकवादी विद्वानों ने ईश्वर और पंथिक आस्थाओं को भी फैंटेसी बताया है। अधिकांश पंथिक आस्थाओं में स्वर्ग व नरक है। स्वर्ग में खूबसूरत स्त्रियां हैं, नरक में यातनाएं।स्वर्ग अ‍ैर नरक अतृप्त लोगों की फैंटेसी हैं। इसी का विस्तार है फैनेटिक यानी पंथिक दुराग्रही।
गीत संगीत मनुष्य का सृजन हैं। लोक संगीत स्वाभाविकता में उगे हैं। कई संगीत विधाओं को मिलाकर बने सृजन को फैंटेसिया कहा जाता है। ‘फैंटेसिया’ बड़ा प्यारा है। इसका अर्थ है तमाम रागों, रागिनियों और प्रचलित अप्रचलित का एकीकृत संगीत सृजन।
कह सकते हैं संगीत-गीत की स्थापित परंपराओं का रस घोलकर तैयार किया गया नया मधुरस। यही सुमधुर लगता है तो ‘फैंटास्टिक’ कहा जाता है। सारा खेल मन का है। तृप्त मन भी ‘फैंटेसी’ – दिवास्वप्न में रमता है और अतृप्त भी। मन का स्वभाव ही स्वप्न देखना है। फिर तृप्ति और अतृप्ति भी कई तरह की होती है। हम राजनैतिक पद प्रतिष्ठा चाहते हैं, यह अतृप्ति है। हम पक्षियों की तरह आकाश में उड़ना चाहते हैं, यह खूबसूरत अतृप्ति है। लेकिन प्रकृति और सृष्टि को मधुमय देखने की तृप्ति को क्या नाम दें? इसमें मन:स्ताप की कोई गुंजाइश नहीं। प्रकृति की मधुमयता की व्याकुलता बेशक एक अतृप्ति है लेकिन इसे फ्रायडवादी ‘मन:स्ताप’ या बेचैनी नहीं कहा जा सकता। इसके उद्भव का केंद्र अतृप्त मन भी हो सकता है और तृप्त भी लेकिन यह एक अनूठी और भव्य अभीप्सा है–एक रम्य फैंटेसी। जान पड़ता है कि हमारे वैदिक पूर्वज इसी रम्य कल्पना में आनंदित थे। तभी जगमग ऋचा मंत्र उगे और मंत्रों में मधुमय संसार की फैंटेसी थी।
फ्रायड के मनोविश्लेषण में लिविडो-जिजीविषा की केंद्रीय भूमिका है। जीवन गहन इच्छा से भरा-पूरा है। लेकिन मनुष्य का मन यहां स्वतंत्र इकाई है। तभी उन्होंने फैंटेसी-स्वप्नलोक को अतृप्त इच्छा का परिणाम बताया। साहित्य सृजन को भी इसी से जोड़ने पर नाराजगी भी हुई। युंग उनके निकटवर्ती मगर ज्यादा अनुभूति वाले मनोविज्ञानी थे। युंग ने मनुष्य के मन को ऊर्जा की तरह देखा। फ्रायड का लिविडो उनके लिए वैदिक साहित्य वाला ‘तेजस’ था। मांडूक्य उपनिषद् के ऋषि ने ब्रह्म को संपूर्ण बताया और कहा कि यह चार चरणों वाला है। यहां एक चरण सूक्ष्मजगत स्वप्नस्थान का भोग करने वाला दूसरा चरण ‘तेजस’ है। उपनिषद् वाला तेजस ही युंग के लिविडो की प्रमुख ऊर्जा है। युंग का लिविडो गतिमान है। इसके भी कई आयाम हैं। युंग ने इन आयामों को ही ‘आर्केटाइप-आदिम’ कहा है। वैदिक अनुभूति में कहें तो चित्त सनातनता का प्रवाह है। युग ने मन के दो स्तर बताए थे – पहला चेतन और दूसरा अचेतन। मनुष्य चित्त का बड़ा भाग अचेतन है, चेतन बहुत छोटा। चेतन के विस्तार की संभावनाएं अनंत हैं। उपनिषद् अनुभूति में चेतन का परम-सर्वोच्च ही परमचेतना है। हम सबका अचेतन बड़ा है, वही प्रभावित करता है, फैंटेसी गढ़ता है, न ठीक से बैठने देता है, न कायदे से जीने देता है। रात में भी स्वप्न बनकर तंग करता है। परम चेतन का बोध गहन जागरण में होता है। तब स्वप्न नहीं बचते और न कोई फैंटेसी अतिशक्तिशाली श्रीमान और गतिमान हैं मन। ऋषियों ने उन्हें ‘चंचल’ कहा है। इस चंचलता का सबसे रोचक पहलू है – वर्तमान से असंतोष। असंतोष दुख देता है लेकिन असंतुष्ट मनोदशा के फायदे भी हैं। हम असंतुष्ट होकर परिस्थिति बदलने के लिए सक्रिय भी होते हैं। सक्रियता की भी प्रेरक शक्ति है मन। भारत ने संतोष को सकारात्मक बताया। संतोष परमधन की कहावत पुरानी है। नीत्से ने बड़ी बात कही कि मनुष्य सत्य के साथ नहीं जी सकता। उसे तमाम आशाएं भविष्य की अभिलाषाएं भी चाहिए। आशा और अभिलाषा मन के रचे प्रपंच होते हैं। लेकिन सत्य संपूर्ण चेतन है, जहां सत्य होगा वहां मन नहीं होगा। पतंजलि के योग सूत्रों में खूबसूरत महाविज्ञान है। उनका लक्ष्य ही है योगश्चित्तवृत्ति निरोध। चित्त वृत्तियों का माफिया है–मन। पतंजलि ने योग में इसी माफिया के नियंत्रण की तकनीकी बताई है। बताया है कि ‘तब साक्षी स्वयं में स्थापित हो जाता है।’ (योगसूत्र ३) लेकिन मन की वृत्तियों में हमारा सबका प्राण साक्षी उन्हीं वृत्तियों के साथ सक्रिय रहता है। (योगसूत्र ४)
पतंजलि ने चित्त की चंचलता का खूबसूरत विवेचन किया है। बताया है कि उनकी संख्या ५ है। वे क्लेश-दुख का स्रोत हैं और दुखविहीनता का भी।’ (वही ५) ठीक कहा है मन की चंचलता दुख का स्रोत है और दुखविहीनता का भी। उन्होंने मन चंचलता को ‘सुख’ का स्रोत नहीं बताया। दुख और दुखविहीनता का ही स्रोत कहा है। दुखविहीनता सुख नहीं होती, रोगविहीनता स्वास्थ्य नहीं होती। स्वास्थ्य बना है-स्व-स्थ से। स्व-स्थ का अर्थ है अपने स्व में होना। जैसे गृहस्थ का अर्थ है घर में होना। उन्होंने चित्त की ५ वृत्तियों के नाम भी गिनाए है– पहली है प्रमाण, दूसरी विपर्यय -यहां जो नहीं है उसका सच माना विपर्यय है। तीसरी वृत्ति विकल्प है। परिस्थितियों का विकल्प गढ़ना कल्पना है और कल्पना-पैंâटेसी है। चौथी है निद्रा। संसार और इंद्रिय संबंध का विच्छेद निद्रा है। मन तो भी सक्रिय रहता है। स्वप्न इसीलिए चलते हैं अंतिम वृत्ति है – स्मृति। स्मृति हो चुकी घटनाओं का मस्तिष्क द्वारा संग्रहित विवरण है। वर्तमान में स्मृति का कोई यथार्थ नहीं होता। मन अपनी चंचलता में इन्हीं ५ वृत्तियों में गति करता है। बार-बार स्वप्न रचता है। सपने सच नहीं होते तो गहन दुख आते हैं बार-बार। वैदिक ऋषियों ने मन की क्षमता का गहन विवेचन किया है।
ऋग्वेद दुनिया की प्रथम प्रकट अनुभूति है। यजुर्वेद में इसी अनुभूति का विस्तार, विकास, विनियोग और उपयोग है। अनुभूतियां लगातार प्रगाढ़ हुई हैं। ऋग्वेद में मन की चंचलता का आख्यान है। कहते हैं कि जो मन बहुत दूर वन या पर्वतों की ओर चला गया है, उसे हम वापस बुलाते हैं, जो मन बहुत दूर आकाश या अंतरिक्ष तक गया है, उसे हम वापस लाते हैं। ऋग्वेद में संसार को बेकार या माया नहीं कहा गया। बार-बार कहते हैं कि ‘हे मन यहीं आओ, इसी संसार में आपका जीवन है।’ संसार आनंद का क्षेत्र है। यही मुक्ति का भी क्षेत्र है। ऋग्वेद के अनुसार सारे काम ‘दक्षमन’ से ही संभव हैं। मन भागता है, न भागे तो व्यक्ति को परमशक्तिशाली और सौभाग्यशाली बनाता है। यजुर्वेद (२.२१) में मन के नियंत्रक देव को ‘मन:स्पत’ बताते हैं और कहते हैं ‘हे मन के परिपालक यह यज्ञ आहुति आपको समर्पित है।’ वेद आस्था ग्रन्थ बाद में बने। इनमें भरा–पूरा विज्ञान है और परिपूर्ण वैज्ञानिक विवेक। यजुर्वेद (२.२४) की प्रार्थना शुद्ध सांसारिक है और हम सबके लिए भी उपयोगी। कहते हैं ‘हम तेजस्विता और पोषक तत्वों से भरपूर हों। मन शुभ संकल्प से युक्त हो। हम संपूर्ण समृद्धिशाली हों।’ समृद्धि बाहरी होती है और आंतरिक भी। शिवत्व से पूर्ण मन आंतरिक समृद्धि का क्षेत्र है।

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