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पड़ताल : एमडब्ल्यू देसाई अस्पताल की मेडिकल लापरवाही … रजिस्टर गायब, इलाज ठप!

– मरीजों को `बैट’ कर रहे डॉक्टर
– खून से सने बच्चे का इलाज करने से भी ठुकराया
– लीगल मामले भी अटक रहे
धीरेंद्र उपाध्याय  

मनपा द्वारा संचालित मलाड के एमडब्ल्यू देसाई अस्पताल में हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि अब वहां मरीजों का इलाज नहीं, बल्कि बहानेबाजी की ड्यूटी लग गई है। रोज सैकड़ों मरीजों को देखने का दावा करनेवाला यह अस्पताल अब अपने ही बुनियादी फर्ज, इलाज और जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह कि अस्पताल में कानूनी मामलों का रिकॉर्ड रखने वाला अनिवार्य एमएलसी रजिस्टर ही गायब है और इसी एक रजिस्टर की आड़ में अस्पताल द्वारा न जाने कितने जख्मी, पीड़ित और खून से लथपथ मरीजों को दरवाजे से लौटाया जा रहा है। आरोप है कि डॉक्टरों ने मानो एक नया सिस्टम ही बना लिया है कि रजिस्टर नहीं है, तो इलाज भी नहीं होगा। मारपीट, सड़क हादसे या किसी भी कानूनी मामले से जुड़ा घायल मरीज आते ही उसे हमारे पास एमएलसी रजिस्टर नहीं है कहकर दूसरे अस्पताल में ‘बैट’ कर दिया जाता है यानी सीधे रेफर कर रिपोर्ट बनाने और जिम्मेदारी से दूर भागना आम बात हो गई है। यह ‘बैटिंग कल्चर’ अब एमडब्ल्यू देसाई अस्पताल की पहचान बन चुका है।
उल्लेखनीय है कि सभी सरकारी और मनपा अस्पतालों को मेडिको-लीगल मामलों यानी ऐसे मामलों के लिए एक एमएलसी रजिस्टर रखना अनिवार्य है जिनमें पुलिस हस्तक्षेप की आवश्यकता हो सकती है। इसमें हिंसा, गिरना, दुर्घटनाएं, आत्महत्या के प्रयास, जानवरों के काटने, संदिग्ध यौन उत्पीड़न, कम उम्र में गर्भधारण और संभावित गड़बड़ी वाले मामले शामिल हैं। लेकिन मलाड पूर्व स्थित एमडब्ल्यू देसाई अस्पताल में मामूली चोटों वाले मरीजों को भी अस्पताल से वापस भेज दिया जाता है। अस्पताल के एक कर्मचारी ने कहा कि माथे पर मामूली कट लगने पर भी मरीज को कहीं और रेफर कर दिया जाता है, सिर्फ इसलिए क्योंकि इसके लिए मेडिकल-लीगल एंट्री की जरूरत होती है। बताया गया है कि रजिस्टर आसानी से बनाए जा सकते हैं, लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है और अब यह काम का बोझ कम करने का एक आसान तरीका बन गया है। ऐसा मुख्यत: अदालती मामलों से बचने, रिकॉर्ड को सावधानीपूर्वक बनाए रखने और पुलिस की दखल अंदाजी को रोकने के लिए किया जा रहा है। एक मामले में मलाड पूर्व के एक निवासी ने बताया कि उसके सात साल के भतीजे को गोरेगांव में फिल्म सिटी रोड के पास एक दोपहिया वाहन ने टक्कर मार दी थी, जिसके बाद वह उसे पास के एक सरकारी अस्पताल ले गया। बच्चे के माथे पर गहरा घाव था और उसे टांके लगाने पड़े। उस व्यक्ति ने कहा कि सरकारी अस्पताल ने कहा कि वे ऐसे मामलों का इलाज नहीं करते। ऐसे में मैं एमडब्ल्यू देसाई अस्पताल गया। वहां उन्होंने मुझे बताया कि वे घाव पर टांके लगा सकते हैं, लेकिन एमएलसी दर्ज नहीं कर सकते, क्योंकि उनके पास वह सुविधा नहीं थी। आखिरकार हमें एक ट्रॉमा अस्पताल जाना पड़ा, जहां हमने टांके लगवाए, एमएलसी दर्ज करवाया और सीटी स्वैâन करवाया। इन सभी प्रक्रियाओं में आखिरकार इलाज करवाने में ९० मिनट गंवा दिए। अस्पताल को तुरंत प्राथमिक उपचार प्रदान करना, एमएलसी रजिस्टर में प्रविष्टि करना और पुलिस को सूचित करना होता है। उन्होंने आरोप लगाया कि नियमित मामलों में बैटिंग की जाती है। डॉक्टरों ने कहा कि एक बार जब मरीजों को बताया जाता है कि एमएलसी दर्ज की जाएगी, तो कई लोग दूसरे अस्पताल नहीं जाना पसंद करते, क्योंकि उन्हें पुलिस के हस्तक्षेप का डर होता है। कई घरेलू हिंसा या हमले के मामलों में, इसका मतलब है कि सच्चाई कभी सामने नहीं आती। मनपा द्वारा संचालित एक अन्य अस्पताल के एक डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि खासकर ओपीडी में यह एक लंबे समय से चली आ रही समस्या है।
अस्पताल बढ़ा, घटती गईं सुविधाएं
अस्पताल की नींव १९७६ में एक २०-बेड वाले मैटर्निटी अस्पताल के रूप में रखी गई थी। धीरे-धीरे इसमें विभाग जुड़ते गए और वर्ष १९९० में मालाड लायंस क्लब की मदद से ६-बेड का एनआईसीयू, वर्ष १९९१ में ईएनटी और ऑप्थल विभाग शुरू किए गए। आज अस्पताल का निर्मित क्षेत्र २३३६.७५ वर्ग मीटर है और कुल १६२ बेड हैं। कागजों पर यह एक बहु-विशेषता सामान्य अस्पताल है, लेकिन हकीकत में यहां दवाओं की कमी, मशीनों की खामियां और मेडिको-लीगल रजिस्टर का गायब होना मरीजों की जान पर बन आया है।
ढांचा है पूरा, लेकिन सिस्टम अधमरा
अस्पताल का भूतल, पहली मंजिल और दूसरी मंजिल रजिस्ट्रेशन, फार्मेसी, इमरजेंसी ओपीडी, ड्रेसिंग रूम, टीबी, ईएनटी, ऑर्थो, लेबर वार्ड, एनआईसीयू, गायनाक, बाल और पुरुष वार्ड जैसे विभागों से भरा हुआ है। रोजाना यहां औसतन २००-३०० ओपीडी मरीज लाइन में लगते हैं। लेकिन इस अस्पताल में भी दवा की किल्लत, टेस्ट के लिए लंबी कतारें और भर्ती मरीजों के लिए सीमित बेड सिस्टम की पोल खोलते हैं। जांच और रिपोर्ट के लिए कई बार दो-दो दिन की देरी होती है।
लोग थककर निजी अस्पतालों की ओर भागते हैं, जहां इलाज तो मिलत्ाा है, पर जेब जल जाती है। कुल मिलाकर इस अस्पताल में हर विभाग मौजूद है, बस सेवा गायब है। एमडब्ल्यू देसाई अस्पताल ज्यादातर मामलों को संभालने में सक्षम है। हालांकि, इसके अधीक्षक डॉ. अरविंद उगले ने कहा कि जहां सभी भर्ती मरीजों के मामले ठीक से दर्ज किए जाते हैं और पुलिस को सूचित किया जाता है, वहीं बाहरी मरीजों के मामलों को ज्यादा उन्नत अस्पतालों में रेफर किया जाता है। उन्होंने कहा कि भर्ती मरीजों के लिए चाहे वह बेड से गिरना हो, गंभीर चोट लगना हो, या कोई भी ऐसा मामला हो जिसमें पुलिस के हस्तक्षेप की आवश्यकता हो। हम हमेशा पुलिस को तुरंत सूचित करते हैं। लेकिन छोटे-मोटे कट या संदिग्ध दुर्घटनाओं जैसे सामान्य मामलों के लिए हम उन्हें दूसरे अस्पतालों में रेफर कर देते हैं, क्योंकि हमारे पास आकलन या फॉलो-अप के लिए पर्याप्त कर्मचारी या वरिष्ठ विशेषज्ञ नहीं होते।
कभी-कभी मरीजों को सीटी स्वैâन या आगे के मूल्यांकन की आवश्यकता होती है और हम यहां वह प्रदान नहीं कर सकते।
समीक्षा कर होगी कार्रवाई
मनपा के स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे उपायुक्त शरद उगले ने कहा कि मनपा अपने आस-पास के अस्पतालों में सभी समस्याओं का समाधान करने का प्रयास कर रहा है। उगले ने कहा कि यह एक गंभीर मामला है और हम इसे सुलझाने के लिए चिकित्सा अधीक्षकों के साथ चर्चा करेंगे और कार्रवाई करेंगे।

लाचार डॉक्टर और सिस्टम है गूंगा  
मलाड (पूर्व) के हाजी बापू रोड गोविंद नगर स्थित एमडब्ल्यू देसाई अस्पताल कभी उत्तर-पश्चिम मुंबई के लिए ‘जीवनरेखा’ माना जाता था। लेकिन आज हालत यह है कि १६२ बेड का यह ढांचा केवल दीवारों और विभागों का गिनती-पुर्जा बनकर रह गया है। यह अस्पताल गोरेगांव पूर्व, मालाड पूर्व और कांदिवली पूर्व जैसी घनी बस्तियों वाले इलाकों की करीब ११ लाख आबादी को सेवा देने का दावा करता है, लेकिन यह अब अपने ही सिस्टम के बोझ तले कराह रहा है।

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