जेदवी
– वॉटर एफ्लुएंट प्लांट पर उठे सवाल!
-रेलवे की लापरवाही की खुली पोल
रेलवे में लंबे समय से चली आ रही लापरवाही को छिपाने का एक ‘कवर-अप’ प्लांट है ‘वॉटर एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट’। पश्चिम रेलवे ने बांद्रा टर्मिनस डिपो में १०० केएलडी क्षमता का एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट लगाया है। कागजों पर दावा किया गया है कि यह प्लांट हर महीने लगभग १२ लाख लीटर गंदे पानी को शुद्ध कर स्टेशन, कोच धुलाई और बागवानी में पुन: उपयोग के लिए तैयार करेगा। दरअसल, यह प्लांट प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की बार-बार मिली चेतावनियों और बढ़ती शिकायतों के बाद उठाया गया कदम है। इस पर अब कई सवाल उठ रहे हैं कि तमाम प्रयासो के बाद भी रेलवे का जल प्रबंधन असफल क्यों है?
मौन है रेलवे
बांद्रा, अंधेरी और बोरीवली खंड में वर्षों से वॉशिंग लाइन का गंदा पानी नालों में बहता रहा है, जिससे आसपास के इलाकों में दुर्गंध और प्रदूषण की समस्या बनी रही। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करने वाली विभिन्न संस्थाओं ने समय-समय पर सवाल उठाए, लेकिन रेलवे मौन रही। आखिरकार, यह कदम इतनी देरी से क्यों उठाया गया? और यह पर्याप्त क्यों नहीं है?
प्लांट से कितनी होगी मीठे पानी की बचत?
मुंबई में पहले ही पानी की सप्लाई टाइट है। वहीं दावा किया जा रहा है कि १२ लाख लीटर प्रति माह पानी की बचत होगी, तो उसके बाद डिपो में पानी का बिल कितना घटा, इसका कोई आंकड़ा पेश नहीं किया गया।
मेंटेनेंस की कमी
अक्सर मशीन लग जाती है, लेकिन सप्लायर गायब और मेंटेनेंस की कमी के कारण सिस्टम बंद हो जाता है। रेलवे कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी गई है कि नहीं, क्योंकि मशीन चलाने वाले की योग्यता तय करती है कि प्लांट चलेगा या बंद हो जाएगा।
एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट की जमीनी हकीकत
एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट की जमीनी हकीकत यह है कि डिपो में अभी भी मीठा पानी टैंकरों से आ रहा है। कर्मचारियों में प्लांट को लेकर स्पष्ट जानकारी की कमी और आउटपुट पानी की परीक्षण रिपोर्ट का सार्वजनिक न होना यह दर्शाता है कि घोषणा बड़ी है, मगर निगरानी का सिस्टम अभी अधूरा है।
रेलवे में अक्सर देखा गया है कि ‘फीता कट गया और मशीन धूल खाती रही।’ यह प्लांट वास्तव में चल भी रहा है या सिर्फ उद्घाटन कर फोटो खिंचवाई गई हैं। क्या इस प्लांट का रनिंग लॉग, आउटपुट डेटा और पानी की परीक्षण रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है? अगर यह प्लांट वास्तव में चालू रहेगा, तो रेल प्रणाली में सतत जल उपयोग का एक मजबूत मॉडल बन सकता है।
रेलवे का दावा!
मुख्य जनसंपर्क अधिकारी विनीत अभिषेक का कहना है कि यह कदम पर्यावरण संरक्षण और जल बचत की दिशा में बड़ा कदम है। प्लांट का पानी कोच धुलाई, प्लेटफॉर्म सफाई, बागवानी आदि में इस्तेमाल होगा।
ट्रीटमेंट का स्टैंडर्ड क्या हैं?
सिर्फ देखने में साफ पानी काम नहीं करेगा। क्या यह पानी आईएसओ-एमपीसीबी-बीआईएस मानकों के अनुरूप है? क्योंकि डिपो में ट्रेनों की धुलाई में रसायन, ग्रीस और तेल इस्तेमाल होता है, इसे साधारण फिल्टर से साफ नहीं किया जा सकता।
