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तहकीकात : रेप पीड़िता को इंसाफ नहीं, जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर संदेह

-फिरोज खान

-आठ महीने की जांच के बाद सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट
देश में बेटियों की सुरक्षा और दुष्कर्म पीड़िताओं को न्याय दिलाने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जब किसी मामले में जांच एजेंसियां ही अपराधी तक पहुंचने में नाकाम रहती हैं तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए। बिहार की राजधानी पटना में नीट की तैयारी कर रही १७ वर्षीय छात्रा की संदिग्ध मौत का मामला इसी गंभीर सवाल को सामने लाता है। आठ महीने की जांच के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी। एजेंसी का कहना है कि किसी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर जांच में चूक कहां हुई।
शुरुआती जांच पर भी सवाल
जहानाबाद की रहनेवाली छात्रा ६ जनवरी २०२६ को पटना के शंभू गर्ल्स हॉस्टल में बेहोशी की हालत में मिली थी। अस्पताल में इलाज के दौरान ११ जनवरी को उसकी मौत हो गई। परिवार ने उसके शरीर पर चोट के निशान होने और यौन हिंसा की आशंका जताई थी। मामले की शुरुआती पुलिस जांच पर सवाल उठने के बाद बिहार सरकार ने जांच सीबीआई को सौंप दी।
लेकिन जांच एजेंसी भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, जांच के दौरान फॉरेंसिक रिपोर्ट, संदिग्धों के मोबाइल रिकॉर्ड और हॉस्टल संचालक से पूछताछ जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को गंभीरता से नहीं लिया गया।
अब सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट ने पीड़ित परिवार की न्याय की उम्मीदों को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है।
न्याय व्यवस्था से जवाब मांगते सवाल
यह मामला केवल एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा से जुड़ा सवाल है। यदि शुरुआती जांच में गंभीरता नहीं दिखाई जाती और बाद में केंद्रीय एजेंसी भी अपराधी तक नहीं पहुंच पाती, तो पीड़ित परिवार न्याय के लिए कहां जाए।
हालांकि, क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने का अर्थ यह नहीं कि अदालत ने मामला अंतिम रूप से बंद कर दिया है। अदालत में छात्रा के पिता का पक्ष सुना जाना है। अब निगाहें अदालत पर टिकी हैं। जरूरत है कि जांच के हर पहलू की निष्पक्ष समीक्षा हो और किसी भी संभावित चूक को नजरअंदाज न किया जाए। सवाल साफ है, अगर ऐसे मामलों में भी सच सामने नहीं आएगा तो रेप पीड़िताओं और उनके परिवारों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा वैâसे कायम रहेगा।

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