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पड़ताल : दवाओं की किल्लत, टूटी मशीनें, भरे वार्ड … ‘स्वास्थ्य संकट का केंद्र’ बना सायन अस्पताल!

बढ़ता तनाव, मरीजों के रिश्तेदार परेशान
१९०० बेड पर ३००० से ज्यादा मरीज
एक बेड पर दो-दो मरीज, कई फर्श पर

धीरेंद्र उपाध्याय

दवाओं की किल्लत, टूटी मशीनें और भरे वार्डों से सायन अस्पताल इन दिनों ‘स्वास्थ्य संकट का केंद्र’ बन गया है। रोजाना बढ़ते दबाव, दवाइयों की कमी, खराब उपकरणों और गंदगी से भरे हालात ने मरीजों और उनके रिश्तेदारों दोनों को भारी तनाव में डाल दिया है। आलम यह है कि १,९०० बेड वाले इस सरकारी अस्पताल में ३,००० से भी ज्यादा मरीज ठूंसे जा रहे हैं, जहां कई वार्डों में एक ही बेड पर दो-दो मरीज लेटे दिखाई देते हैं, जबकि दर्जनों को फर्श पर गद्दा डालकर रखा जाता है। इन असहनीय स्थितियों ने न केवल अस्पताल प्रशासन की पोल खोल दी है, बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि मुंबई जैसे महानगर में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था किस हद तक चरमराई हुई है।
मुंबई का सायन अस्पताल इन दिनों गंभीर अव्यवस्था और संसाधनों की किल्लत का प्रतीक बन चुका है। जहां एक तरफ दवाओं की कमी से मरीजों को बाहर से महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ साफ-सफाई की बदहाली, उपकरणों की खराबी और ओवरलोडेड वार्ड अस्पताल को एक बड़े स्वास्थ्य संकट की ओर धकेल रहे हैं। अस्पताल में स्वच्छता की स्थिति बेहद खराब है। गंदे बेड, मैली चादरें और बदबूदार टॉयलेट मरीजों के लिए खतरा बन गए हैं। मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि वार्डों की हालत इतनी खराब है कि सही से चलना भी मुश्किल होता है। अस्वच्छ माहौल में संक्रमण का खतरा लगातार बढ़ रहा है। उपकरणों की खराबी ने मरीजों की परेशानियां कई गुना बढ़ा दी हैं। अस्पताल की दो एमआरआई मशीनों में से एक महीनों से बंद पड़ी है, जिससे अपॉइंटमेंट पाने के लिए मरीजों को दो से तीन महीने इंतजार करना पड़ रहा है। सीटी स्कैन के लिए भी सुबह से लंबी कतारें लग जाती हैं, जिससे गंभीर मरीजों का समय पर निदान नहीं हो पाता। थैलेसीमिया मरीजों पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ रहा है। ब्लड बैंक में स्टॉक की कमी और लगातार अनियमितता के कारण करीब २८० मरीजों को नियमित रक्त मिलना भी चुनौती बन गया है। सिर्फ वार्ड ही नहीं, अस्पताल का बेसमेंट भी डरावनी स्थिति में है। यहां कूड़ा, टूटे मेडिकल उपकरण, बेकार फर्नीचर और ज्वलनशील सामान का अंबार लगा हुआ है। अवरुद्ध रास्ते और आग की आशंका ने इसे एक ‘टाइम-बॉम्ब’ बना दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह किसी भी समय बड़ा हादसा पैदा कर सकता है।
४०० सर्जरी रोज, लेकिन ‘लाइफलाइन’ ही संसाधनों से खाली
सायन अस्पताल मुंबई की एक महत्वपूर्ण लाइफलाइन है, जहां हर दिन ४०० से ज्यादा सर्जरी होती हैं। १०० एंडोस्कोपी और १० एंजियोग्राफी की जाती हैं। इसके बावजूद दवाओं, स्टाफ, उपकरणों और साफ-सफाई की भारी कमी अस्पताल की कार्यक्षमता को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। मरीजों और परिजनों का कहना है कि अस्पताल अपनी क्षमता से कई गुना ज्यादा भार झेल रहा है और प्रशासन की लापरवाही ने स्थिति को और खराब कर दिया है।
५,०००-७,५०० मरीज रोज, पर संसाधन वही
सायन अस्पताल हर वर्ष करीब २२ लाख मरीजों का इलाज करता है। ओपीडी में रोज ५,००० से ६,५०० मरीज आते हैं। इतनी बड़ी संख्या में मरीजों को संभालने के बावजूद अस्पताल में दवाओं, उपकरणों और स्टाफ की भारी कमी है। मनपा एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया कि दवाइयों की आपूर्ति की कमी बनी रहती है।
वार्डों में अराजकता
अस्पताल में भीड़भाड़ का आलम यह है कि १,९०० बेडों पर ३,००० से ज्यादा मरीज भर्ती रहते हैं। मेडिसिन वार्ड ६, ७ और २० में तो कई बार एक ही बेड पर दो-दो मरीज लेटे दिखाई देते हैं, जबकि कई मरीज फर्श पर गद्दा डालकर पड़े रहते हैं। एक बार तो ४०-५० मरीजों की क्षमता वाले वार्ड में १०५ मरीज रखे गए थे। मरीज के रिश्तेदार सुमित धर बताते हैं कि बेडों के बीच चलने की जगह भी नहीं है। रिश्तेदार बेड तक पहुंच भी नहीं पाते। गंदे बेड, मैली चादरें और अस्वच्छ टॉयलेट हालात को और खराब करते हैं। धारावी, कुर्ला, चेंबूर जैसे घनी आबादी वाले इलाकों के अलावा ठाणे, नई मुंबई और रायगड से भी भारी संख्या में मरीज यहां आते हैं।

दवाओं का टोटा, मरीजों की जेब पर बोझ
६७ वर्षीय नूर शेख के रिश्तेदार दानिश शेख ने बताया कि उन्हें अस्पताल में उपलब्ध न होने के कारण ७,००० रुपए की दवाइयां बाहर से खरीदनी पड़ीं। रात में पैसे की कमी होने पर उन्हें दोस्तों से उधार लेना पड़ा। एक अन्य मरीज मनोज सिंह ने कहा कि डॉक्टर जो दवा लिखते हैं, वह यहां मिलती ही नहीं। बाहर महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। सरकारी अस्पताल भी अब निजी जैसा खर्च करवाने लगा है। ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, क्योंकि अस्पताल में जरूरी दवाइयां अक्सर खत्म हो जाती हैं। इस कारण मरीजों को बाहर से महंगा उपचार लेना पड़ रहा है।

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