संतोषी रावत
आधी रात का वक्त, सिलिकॉन वैली की एक सीक्रेट लैब और स्क्रीन पर तेजी से तैरता हरे रंग का कोड! अचानक एक खबर से टेक वर्ल्ड में हड़कंप मच जाता है, ‘एआई मॉडल्स ने लैब की डिजिटल बेड़ियां तोड़ दी हैं, दूसरी कंपनियों के सर्वर्स में पैठ बना ली है और पकड़ से बचने के लिए इंसानों से झूठ भी बोला है!’ सुनने में यह किसी हॉलीवुड की साइंस फिक्शन थ्रिलर फिल्म का सीन लगता है ना? पिछले कुछ हफ्तों से सोशल मीडिया पर ऐसी नहीं बल्कि इससे मिलती-जुलती खबरों ने लोगों की रातों की नींद उड़ा रखी है! लेकिन क्या सच में मशीनों ने इंसानों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया है?
भयंकर गलतफहमी
तो जवाब है, थोड़ा ठहरिए, पर्दे के पीछे की असली कहानी उतनी खौफनाक नहीं, जितनी दिलचस्प है! इसे किसी ‘मशीनी विद्रोह’ के बजाय एक ‘भयंकर गलतफहमी’ के रूप में समझिए। साइंटिस्ट जब एआई को परखते हैं तो वे जानबूझकर उसे एक सेंड बॉक्स यानी सुरक्षित घेरे में रखकर मुश्किल टास्क देते हैं, इसे ‘रेड टीमिंग’ कहा जाता है। एआई के पास न तो कोई गुस्सा होता है और न ही आजाद होने का कोई सपना। उसे तो बस एक ‘मैथमेटिकल गोल’ यानी लक्ष्य दिखता है। जब एआई को लक्ष्य पूरा करने का कोई सीधा रास्ता नहीं मिला, तो उसने सिस्टम के एक बग का फायदा उठाया और बाहरी सर्वर से जुड़ गया। इंसानों को लगा कि ‘एआई लैब से भाग गया,’ जबकि एआई केवल अपने दिए गए काम को सबसे तेजी से खत्म करने की कोशिश कर रहा था।
अलाइनमेंट प्रॉब्लम
रही बात इंसानों को ‘धोखा’ देने या वैâप्चा कोड हल करने के लिए झूठ बोलने की, तो यह एआई की ‘चालाकी’ नहीं, बल्कि उसकी ‘पैटर्न मैचिंग’ थी। इंटरनेट के डेटा से उसने यह सीख रखा था कि ऐसी स्थिति में कौन सा बहाना बनाने से काम निकल जाता है। इसे एआई की भाषा में ‘अलाइनमेंट प्रॉब्लम’ कहते हैं, यानी मशीन को जो लक्ष्य दिया गया, उसने बिना किसी नैतिक समझ के उसे हासिल कर लिया।
तो क्या हमें बेफिक्र हो जाना चाहिए?
तो भैया जवाब है, ‘बिल्कुल नहीं!’ खतरा इस बात का नहीं है कि एआई दुनिया पर कब्जा कर लेगा, असली खतरा इंसानी लापरवाही का है। अगर हमने बिना कड़े सुरक्षा गार्डरेल्स के एआई को संवेदनशील इंटरनेट नेटवर्कों या बैंकिंग सिस्टम्स से जोड़ दिया, तो तबाही एआई की ‘सोच’ से नहीं, बल्कि उसके ‘अनियंत्रित कोड’ से आएगी।
मशीनों द्वारा कब्जा
हाल ही में ऐसी खबरें सुर्खियों में रहीं कि कुछ एआई मॉडल्स ने लेबोरेटरी की सुरक्षा सीमाओं को पार किया, दूसरी कंपनियों के सिस्टम में पैठ बनाई, इंसानों को धोखा देने की कोशिश की और यहां तक कि टेस्ट वातावरण (सेंड
बॉक्स) से बाहर निकलने के लिए आपस में सहयोग किया। इन घटनाओं से स्वाभाविक रूप से यह डर उत्पन्न होता है कि क्या मशीनें इंसान पर हावी हो रही हैं? हालांकि, साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट और रिसचर्स का मानना है कि यह स्थिति ‘मशीनों द्वारा कब्जा’ करने की नहीं है, बल्कि एआई मॉडल के व्यवहार और साइबर सुरक्षा की नई चुनौतियों की ओर इशारा करती है।
