मुख्यपृष्ठस्तंभगजबे है : इंसाफ के लिए क्या वायरल होना जरूरी है..?

गजबे है : इंसाफ के लिए क्या वायरल होना जरूरी है..?

उमा सिंह

अस्पताल के अंदर एक पति अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा था, सांसें टूटी-टूटी सी और उम्मीदें डगमगाती। हर बीतता पल जैसे उसके हाथों से जिंदगी को थोड़ा-थोड़ा खींच रहा था और बाहर उसकी पत्नी खड़ी थी, आंखों में डर और दिल में एक ही गुहार के साथ कि कोई मेरे पति को बचा ले।
दरअसल, मध्य प्रदेश के कटनी से सामने आई एक घटना ने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया है। शुक्रवार की रात करेला बरही निवासी ३२ वर्षीय युवक को सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो जाने के बाद उसे तत्काल १०८ एंबुलेंस से जिला अस्पताल लाया गया। रास्ते में घायल युवक की हालत बिगड़ती गई और उसे उल्टियां होने लगीं, जिससे एंबुलेंस गंदी हो गई। अस्पताल पहुंचते ही जहां एक ओर डॉक्टरों ने गंभीर हालत को देखते हुए इलाज शुरू किया, वहीं दूसरी ओर बाहर खड़ी उसकी पत्नी को एक अलग ही परीक्षा से गुजरना पड़ा। एंबुलेंस कर्मचारी ने महिला को ही वाहन की सफाई करने के लिए मजबूर किया। पति की गंभीर स्थिति और मानसिक तनाव के बीच महिला ने मजबूरी में एंबुलेंस पर पानी डालकर उसे साफ किया। जिला अस्पताल के बाहर का यह दृश्य सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि उस दर्द की कहानी है, जिसे शब्दों
में बयां करना मुश्किल है। जिस वक्त उसे अपने पति के लिए दुआ करनी चाहिए थी, उस वक्त वह मजबूरी में पानी और कपड़ा लेकर एंबुलेंस साफ कर रही थी। यह दृश्य किसी फिल्म का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था की हकीकत बन चुका है। वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, लोगों का गुस्सा फूट पड़ा।
सवाल सिर्फ एक महिला के साथ हुए इस व्यवहार का नहीं है, बल्कि उस सिस्टम का है, जहां इंसानियत कभी-कभी नियमों और लापरवाही के नीचे दब जाती है। अस्पताल प्रशासन ने जांच की बात कही है, लेकिन यह सवाल अभी भी बाकी है क्या हर बार इंसाफ के लिए एक वीडियो का वायरल होना जरूरी है? उस महिला की आंखों में जो डर, थकान और लाचारी थी, वह आज भी जवाब मांग रही है। यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारी व्यवस्था में सुधार सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया है और जमीन पर इंसानियत कहीं पीछे छूट गई है। सच में, सब गजबे हैं….!

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