सैयद सलमान मुंबई
दुनिया में कुछ लोग अपने ओहदों से नहीं, बल्कि अपने किरदार से बड़े बनते हैं। भारत के ‘ग्रैंड मुफ्ती’, अबू बकर मुसलियार साहब ऐसे ही एक शख्स हैं, जिनका जीवन इस बात की मिसाल है कि जब इरादे नेक हों और नीयत पाक हो तो न कोई सरहद आड़े आती है, न कोई मजहबी दीवार।
रहमत
९४ वर्ष की उम्र में, जब ज्यादातर लोग खुद को दुनिया से अलग कर लेते हैं, अबू बकर साहब ने एक असंभव-सा लगनेवाला कार्य कर दिखाया। भारत की नागरिक निमिषा प्रिया, जो यमन की जेल में मौत की सजा का इंतजार कर रही थीं, अब एक नई आशा के साथ अपने घर लौटने का सपना देख रही हैं। यह उम्मीद किसी राजनीतिक दबाव या कूटनीतिक डील का नतीजा नहीं, बल्कि एक बुज़ुर्ग धर्मगुरु के इंसानी प्रयासों की वजह से है।
२०१७ में यमन में बतौर नर्स काम कर रहीं निमिषा का अपने बिजनेस पार्टनर तलाल अब्दो महदी से विवाद हो गया। आरोप है कि पासपोर्ट और अपनी सुरक्षा के प्रयास में उन्होंने महदी को बेहोश करने के लिए दवा दी, लेकिन अधिक मात्रा में दवा देने से उसकी मौत हो गई। अदालत ने इसे कत्ल माना और २०२० में उन्हें मौत की सजा सुना दी। अपीलें खारिज हो चुकी थीं और फांसी की तारीख १६ जुलाई २०२५ तय हो गई थीं। निमिषा को बचाने की सभी कोशिशें नाकाम हो चुकी थी। भारत सरकार की कूटनीतिक पहुंच और उम्मीदें भी लगभग खत्म हो चुकी थीं। इसी अंधेरे में एक रोशनी बनकर उभरते हैं अबू बकर मुसलियार। न कोई पदवी लहराई, न कोई प्रेस कॉन्प्रâेंस की, बस एक सच्चे और पाक सूफी दिल की तरह उन्होंने यमन के शीर्ष शेखों और वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंच बनाई। उन्होंने सिर्फ इतना याद दिलाया कि इस्लाम के मूल में ‘रहमत’ है। मजहब के नाम पर उन्होंने कोई राजनीतिक कार्ड नहीं खेला। सिर्फ यह याद दिलाया कि इस्लाम का मूल संदेश ‘दया, माफी और इंसाफ’ कभी पुराना नहीं होता।
हिंदुस्तानी तहजीब
अबू बकर साहब ने जिस नम्रता, समझदारी और सहिष्णुता से यमन सरकार से संवाद किया, वह सराहनीय है। उन्होंने किसी को झुकाया नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ा। यमन की न्याय व्यवस्था बेहद कठोर मानी जाती है, लेकिन मौत की सजा पर फिलहाल रोक लगाने को वह तैयार हो गया है। अब संभव है कि यमन के ‘ब्लड मनी’ कानून के तहत पीड़ित परिवार से सुलह कर निमिषा को भारत लौटने का मार्ग मिल सके। ‘ब्लड मनी’ उस ‘राशि’ को कहा जाता है, जो किसी व्यक्ति की हत्या या मृत्यु के बदले उसके परिजनों को क्षतिपूर्ति स्वरूप दी जाती है, ताकि वे क्षमा कर दें और कानूनी कार्रवाई रोकी जा सके।
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि मुसलमानों के एक बड़े धर्मगुरु ने एक हिंदू महिला की जान बचाने के लिए आगे बढ़कर कदम उठाया। इस मुल्क ने बहुत कुछ देखा है, कभी मजहब के नाम पर बहाए गए आंसू, कभी नफरत की सियासत, कभी ईमान को जाति में तोलने की कोशिश। लेकिन इस एक वाकये ने मानो सारी शंकाओं को धो डाला। ये उस गंगा-जमुनी तहजीब का एक ऊंचा प्रतीक है, जिससे भारत की जमीन हमेशा महकती रही है।
इंसानियत
अबू बकर साहब का यह कदम यह बताने की एक कोमल कोशिश थी कि मज़हब हमें बांटता नहीं, जोड़ता है, अगर हम उसे सही अर्थों में समझें। एक हिंदू महिला के लिए एक मुस्लिम धर्मगुरु की दुआ और कोशिश उस सामाजिक ताने-बाने का सबसे खूबसूरत नमूना है, जिसमें भारत की आत्मा बसती है। इसमें न राजनीति है, न कोई व्यक्तिगत स्वार्थ। जहां सिर्फ इंसानियत है और वह सच्ची भारतीयता, जो कहती है; ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’। अबू बकर मुसलियार साहब को सलाम है। वे आज के वक्त में उस उम्मीद का नाम , जो किसी मजहब का मोहताज नहीं है। उन्होंने इंसानियत को उसका असली स्वरूप लौटाया है, जैसा कि उपनिषद सिखाते हैं; ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ और जैसा कि कुरआन कहता है, ‘जो एक जान बचाए, मानो उसने पूरी इंसानियत को बचा लिया।’
निमिषा प्रिया की फिलहाल फांसी टली है। आगे फांसी होगी या नहीं, यह मकतूल के परिजनों पर निर्भर करता है, लेकिन इस घटना ने सबको यह सोचने पर मजबूर तो किया ही है कि जब धर्म के नाम पर अलगाव और द्वेष को हवा दी जा रही है, तब असल में जरूरत है ऐसे किरदारों की जो धर्म को महज इंसानियत की सेवा का जरिया मानते हैं। अबू बकर साहब ने हर भारतीय के जेहन के उस सोए हुए हिस्से को फिर से जगा दिया, जिसे शायद अफवाहों और घृणा ने थोड़ा कमजोर कर दिया था। देशवासियों को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए कि ऐसे समय में जब धर्म की असल आवाजें नफरत की सियासत में दब जाती हैं, तब उन्होंने सिखाया कि एक सच्चा धर्मगुरु वही होता है जो सच को, इंसाफ को और मानवता को सर्वोपरि मानता है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
