लकीरों का सफर

 

बिगड़ा मुकद्दर कभी नही सुधरता
कर्म रेखाओं का है तमाशा
सपने बुनते हैं सब
कोई फतेह हासिल करता
कोई शिकस्त
आग से खेलना तो जरूरी बनता
बिना खेले जीवन नही चलता
पानी की बूंद बूंद से
प्यास कहां बुझती
ढल जाता है जीवन
आस नही भरती
काम का आगाज़ तो होता
पर अंजाम उसका खाली जाता
क्या करें घड़ी की सुई
हम पर भी दृष्टि डालती
जिंदगी को आगे बढ़ने में
सहायक होती
रिश्ते भी टूट जाते हैं
वक़्त के साथ साथ
बस गिले शिकवे रह जाते हैं
आस पास
दर्द में कोई साथ नही देता
बस मतलब के लिए मंडराते हैं
आस पास
कोई आए कहीं से
जो सब कुछ जोड़े, तोड़े नही
ग़म के साये को दूर भगाएं
जिंदगी को बस अब कोहेनूर बनाए

अन्नपूर्णा कौल, नोएडा

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