मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव: दादी का गुस्सा और कैलाश

काहें बिसरा गांव: दादी का गुस्सा और कैलाश

पंकज तिवारी

दादी अपने सखी मनोरमा के साथ आंगन में बैठी माठा मार रही थीं कि कैलाश भाग कर आया और तुरंत दादी के गोद में मुंह छिपाकर, जोर-जोर से भोंकार छोड़ रोने लगा। दादी घबरा गई। ‘का भऽ..? केउ मारेश्हऽ का रे..? बताउ.. बताउ.. बताउ रेऽ का भऽ..?’- दादी के लगातार पूछने के बाद भी बेचारा कैलाश जैसे कुछ बोल ही नहीं पा रहा था। हां, उसका रोना अब तक सिसकने में बदल गया था। दादी अब उसके सिर पर हाथ फेरते और दुलारते हुए पूछने लगी थी।
थोड़ी देर बाद जब कैलाश थोड़ा हल्का महसूस करने लगा तब जाकर अपना सिर ऊपर उठाया। चारों तरफ निगाह दौड़ाई। अगल-बगल किसी और को न देखकर दादी को बताने लगा।
‘माई.. बताई नऽ.., हम नऽ ईश्वर ददा के हिंया टी.बी. देखइ गऽ रहे। अगले-बगले के अउर लड़िकउ गऽ रहेन। चिखुरियउ रहा रे माई…।’
‘हां… हां… तब का भऽ…? अउर आगे बताउ.. का होइ गऽ…?’ माई हम सब न खोब बढ़िया से टीबी देखत रहे कि पता नाइ कहां से ईश्वर ददा आइ गयेन…?’ ‘अए त ओनकर घर हवइ त वो अइहंइ नऽ।’ ‘हां तबइ तउ न माई… अउतइ मान सब के अपने घरे में देखेन अउर भड़क गयेनि। माई बताई न सब से ज्यादा वो हमहिन के बोलेन हऽ। बहुत-बहुत देर तक डाटन रहेन रे माई।’
कहानी पूरी होते तक दादी की आंखों में आंसुओ का सैलाब था। दादी अपने नाती को अपने सीने से लगाकर देर तक रोती रहीऽ, सारा गुस्सा खुद में ही जज्ब करती रहीऽ। ‘खोट जब अपनेन में बाऽ त हम दुसरे के दोष काहें देई? कब से त कहत हई बुढ़ऊ से कि एक्खे टी.बी. लियाइ दऽ… एक्खे टी.बी. लियाइ दऽ…, मुला पता नाइ काउ चलत बा बुढ़ऊ के मने में कि टिबिया के डब्बा कहिके गरियावथेन’ मन में ही बुदबुदाई दादी।
‘काऽ कहे ह माईऽ’- कैलाश बोला।
‘कुछ नाइ भैया, आवइ द आज बुढ़ऊ के, आज अगर टी.बी. न आइ त ओनकर दाना-पानी कुलि बंद…।’ दादी का आज का गुस्सा अब तक का सबसे भारी गुस्सा था, मन था कि कलकलाहट से तड़प रहा था। माई बताई न वो इहउ कहेन हऽ कि ‘एतनइ देखवइया रहा होतऽ त एक्खे टीवी खरिदवाइ लिहे होतऽ अपने बाबू से। माई रे बबुअउ के बहुत कुछ कहत रहेन रे।’ अब तक तो सारे गुस्से को खुद में दबाती रही थी दादी पर अब उनसे रहा नहीं गया और गुस्से में भड़क उठी दादी, आग में पड़े तड़के की भांति।
दादी बोली- ‘का चल् त बताई ओका बुढ़वा के हम…, चल्.. चल्.. जल्दी चल्..।’- दादी वैâलाश का हाथ पकड़ी और तेज कदमों से बाहर निकल गईं। हवा जैसे और जोर से चल पड़ी होऽ। बिलार झार के दुआर की ओर भागी पीछे-पीछे कुक्कुर भागा। गिलहरी जो दरवाजे पर आराम से कुछ तो खाने में लगी हुई थी, घबरा कर पेड़ के ऊपर भागी। चारों तरफ कुछ अनहोनी सा होने वाला हाल हो गया। दुआरे अब तक ददा आ गये थे और गोरुअन को घास-पानी देने में लग गए थे। बूढ़ा को ऐसे भागते देखकर घबरा गए। झौवा वहीं हउदा के पास रखकर दादी के पीछे-पीछे भागे। घबरा तो खैर वैâलाश भी गया था पर मन ही मन खुश भी था कि ‘चल आज बुढ़ऊ के मजा चिखाइ जाए। आज हमरे बूढ़ा माई ओनका एकदम से सही कइ देइहंइ। रोज-रोज के मजा एक्कइ दिना में निकालि देए हमरे बुढ़िया माई। बहुत बनत रहेन आपन घर देखिके। अपने घरे त कुकुरउ शेर होथऽ। बड़ा आइ हयेन ह टीवी वाला।’ दादी भागी चली जा रही थीं जैसे चली जा रही हो जोर की आंधी और जो आगे ईश्वर के पास पहुंच कर निश्चिंत ही आंधी में तब्दील हो जानी है। ददा दादी को आवाज देते हुए पीछे-पीछे भागते रहे, जबकि दादी जैसे कुछ सुन ही नहीं रही थीं और आगे… बस आगे भागी चली जा रही थीं।
क्रमशः
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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