विमल मिश्र, मुंबई
पोइसर की बिहारी टेकड़ी। मुंबई का बिहारी, मैथिल और झारखंडी यहां रहते हुए बिहार की धरती से जुड़ी, छोटी-बड़ी कोई बात मिस नहीं कर सकता। मिथिलानगर, पंचवटी, चित्रकूट, वैâलाशपुरी सभी को अपने में समाए बिहारी टेकड़ी में इन सूबों की ऐसी कोई चीज नहीं है, जो नहीं मिलती। कोलाबा, ग्रांट रोड, वडाला, धारावी व सायन सहित मुख्य शहर, खार दांडा, गजधर बांध, प्रताप नगर (जोगेश्वरी-पूर्व), ठाकुर कॉम्प्लेक्स, मालवणी, कांदिवली, गोराई, दहिसर (रतन नगर) व विरार-नालासोपारा सरीखे पश्चिमी उपनगर और मुलुंड, ठाणे, चेंबूर, गोवंडी, भिवंडी, उल्हासनगर, खारघर (नई मुंबई) जैसे पूर्वी उपनगर – ऐसी बिहारी टेकड़ियां महानगर में हर जगह पैâली पड़ी हैं।
छठ पर्व शुरू होते ही ये बिहारी, मैथिल और झारखंडी ठिकाने सूने होने लगे हैं। छठ ही गांव और प्रवासी के बीच वह भावनात्मक पुल है, जो उसे हर बार मुंबई से अपने घर-दुआर ले जाता है। लाखों-लाख लोग लंबी यात्रा के नाना प्रकार के कष्ट झेलकर मुंबई से अपने घर-बार पहुंच रहे हैं। बचे हुए सूर्य भगवान की बहन छठी मइया को प्रसन्न करने ३६ घंटे का निर्जला उपवास रखकर सिर पर प्रसाद से भरा सूप थामे समुद्र, नदी व सरोवर तटों पर सपरिवार और बंधु-बांधवों के साथ उमड़े आए हैं। वाद्यवृंद और लोकगीतों की धुनों के साथ, आकाश में बुझती और उगती सुनहरी किरणों के बीच आनत नयन, नाक तक लंबी मांग भरे, आंचल ओढ़े, अस्त होते और उदीयमान सूरज देवता को अर्घ्य देते हाथ ही हाथ दिखते हैं। लहरों पर तैरते असंख्य दीपकों की लौ में समुद्र तट जैसे किसी दूसरे लोक सा लगने लगा है जुहू बीच।
ऐसे बना महा उत्सव
३३ वर्ष पहले मुंबई में संगठित छठ पूजा की शुरुआत करनेवाले बीजेपी बिहार प्रकोष्ठ के संस्थापक मोहन मिश्र का सपना था कि महानगर में बसे हुए लाखों प्रवासी परिवार अपनी जड़ों और परंपराओं से जुड़े रहें, ताकि अगली पीढ़ी तक इसकी गरिमा पहुंचती रहे। मोहन मिश्र ने यह काम १९९२ में ६० परिवारों को जुहू बीच पर लाकर सामूहिक पूजा से शुरू किया। अब यह पूरे देश के महा उत्सव में बदल गया है। अकेले जुहू बीच पर आज पांच लाख से अधिक लोग जुटते हैं। उनके पुत्र छठ उत्सव महासंघ के महामंत्री दिवाकर मिश्र बताते हैं, ‘पिताजी ने सीमित संसाधनों में, छोटे स्तर पर घाट बनाकर सार्वजनिक छठ पूजा का आयोजन शुरू किया। साधनों की कमी व प्रशासनिक चुनौतियों के साथ मुंबई जैसे महानगर में जगह तलाशना एक बड़ी समस्या थी। धीरे–धीरे लोगों ने हाथ बंटाया और शुरुआती मुश्किलों के बावजूद यह आयोजन हर वर्ष और भव्य होता गया। आज बिहार से आए हुए सात-आठ लाख लोगों और चार-पांच लाख झारखंडियों ने मुंबई, ठाणे और आस-पास बिहार असोसिएशन, बिहारी जनसेवा समिति, मिथिला मंडल, बिहार प्रवासी संघ, नई मुंबई बिहार असोसिएशन, झारखंडी एकता संघ, झारखंडवासी परिवर्तन संघ, झारखंड महाराष्ट्र युवा मंच और झारखंड सेवा संघ जैसे संगठन बना रखे हैं और समुद्र, नदी व सरोवर तटों पर यह आयोजन करते हैं।
छठ का संभवत: विश्व में सबसे विशाल सामूहिक आयोजन संभवत: फिल्मी नगरी मुंबई में ही होता है। राम शंकर, ज्ञानेश्वर दुबे, विंध्यवासिनी देवी, विजया भारती से शुरू होकर उदित नारायण, रवींद्र जैन, भरत व्यास, शारदा सिन्हा, मालिनी अवस्थी, कल्पना पटवारी सरीखे गायक-गीतकार-संगीतकार और अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, जितेंद्र, गोविंदा, प्रियंका चोपड़ा, मनोज वाजपेयी, सुनील शेट्टी, विवेक ओबेरॉय, पंकज त्रिपाठी, भाग्यश्री, सुनील पाल, राजपाल यादव, रवि किशन, मनोज तिवारी, पवन सिंह, खेसारीलाल यादव जैसे जाने-माने फिल्मी नाम जुहू के छठ मंचों की शोभा बनने लगे हैं। आज भोजपुरी का तो ऐसा कोई गायक नहीं है, जिसने जुहू बीच पर अपनी प्रस्तुति न दी हो। इनमें छठ पर्व की सुर-ताल कहलाने वाली शारदा सिन्हा भी हैं। सच पूछें तो मिथिला सहित बिहार और झारखंड के छठ का मुंबई में नजारा करने के लिए जुहू से बेहतर ठिकाना और नहीं है। विख्यात पत्रकार, कथाकार और चित्रकार प्रकाश बाल जोशी बताते हैं, ‘यह अब केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं रहा है।’
विशालतम आयोजन
छठ अपार ऊर्जा के स्रोत साक्षात देव भगवान भुवन भास्कर और प्रकृति मां की आराधना का चार दिवसीय आध्यात्मिक आयोजन है। सामाजिक सौहार्द, सद्भाव, शांति, समृद्धि और सादगी का महापर्व, जिसमें डूबते सूर्य को भी पूजा जाता है। कितना गहरा संदेश है कि अगर जीवन में कुछ अस्त होता है तो उदय भी निश्चित है। इस पूजा में कोई पंडित-पुरोहित केंद्रित अनुष्ठान नहीं होता। मुखिया होती है घर की व्रती और सहयोगी की भूमिका में रहते हैं पुरुष व घर के बाकी सदस्य। मातृत्व की प्रतीक छठी मइया इस तरह स्त्रियों के त्याग और संतान सुख की आकांक्षा का प्रतीक बन जाती हैं। जाने-माने एनजीओ ‘मेघाश्रय’ की प्रमुख सीमा सिंह बताती हैं, ‘नारी सशक्तीकरण का अद्भुत उदाहरण है यह पर्व।’
आयरलैंड में भारत के पदस्थ राजदूत अखिलेश मिश्रा बताते हैं, ‘सूर्य की आराधना में निहित मूल आदर्श है – निष्पक्षता और लोककल्याण।’ छठ पर्व में ऐसे कई तत्व शामिल हैं, जो आधुनिक विज्ञान से पूरी तरह मेल खाते हैं। विख्यात पौराणिक कथाविद, लेखक व वक्ता देवदत्त पटनायक लिखते हैं, ‘जगत की उत्पत्ति का अंत व कारण और सभी ग्रहों में प्रमुख देव हैं सूर्यदेव। सुबह उठते ही रात्रि के अंधकार के भय को लील कर सूर्य देवता का प्रकाश स्वागत करता है। इस प्रकार सूर्योदय बहुत शुभ, पवित्र और फलदायी है।’ खगोलीय आधार और शास्त्रीय गणना के कारण छठ का ज्योतिषीय महत्व भी कम नहीं है। आध्यात्मिक गुरु विख्यात ज्योतिषाचार्य सदगुरुश्री दयाल (डॉ. स्वामी आनंद जी) बताते हैं, ‘अंतर्चेतना की गड़गड़ाहट, आत्मा और प्रकृति के मध्य संवाद का उत्सव। छठ पूजा सूर्योपासना का अद्वितीय अनुष्ठान है।’ विख्यात शास्त्रीय गायिका डॉ. सोमा घोष बताती हैं, ‘छठ पूजा केवल सूर्य उपासना नहीं है, बल्कि सूर्य से यह सीख है कि हर पतन के बाद भी एक बार फिर नूतन ऊर्जा और प्रकाश के साथ अवश्य उठना चाहिए।’ छठ गीतों के उदीयमान गायक काशी के सौरभ मिश्र – जिनके लिए छठ पूजा का सबसे प्रेरणादायी पक्ष है, श्रद्धालुओं का संगीतमय उत्साह बताते हैं – ‘भक्ति से ओत-प्रोत छठ के लोकगीत प्रार्थना ही नहीं, बल्कि अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर भी हैं।’ मुंबई के कस्टम कमिश्नर असलम हसन के अनुसार, ‘अमीर-गरीब, ऊंच-नीच का भेद मिट जाता है। आप यहां शुद्धता व अनुशासन के साथ-साथ सांप्रदायिक सद्भाव की साझी संस्कृति का भी दर्शन करते हैं।’ ‘एक प्रशासक के रूप में छठ मेरे लिए परीक्षा भी है और प्रेरणा भी’, बताती हैं राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय की निदेशक निधि चौधरी।
विख्यात उद्योगपति और बिहार एसोसिएशन, मुंबई के पूर्व अध्यक्ष बी.एन. सिंह कहते हैं, ‘छठ पर्व स्थानीय उत्पादों, कुटीर उद्योग और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देता है। इसलिए यह सामुदायिक आर्थिक उत्सव है।’ हामी भरते हैं वित्तीय विशेषज्ञ पंकज जायसवाल, ‘इस पर्व से गांव-कस्बों और शहर के बीच आर्थिक लेन-देन बढ़ता है। किसानों को अपने उत्पादों के लिए बेहतर मूल्य मिलता है और कुटीर उद्योग और हस्तशिल्प को मौसमी सशक्त बाजार। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी भी बढ़ती है, क्योंकि प्रसाद बनाने और सजावट के अधिकांश कार्य महिलाएं ही करती हैं।’
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)
