राजन पारकर
नासिक विधान परिषद चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार गोकुल गीते की जीत ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी। बड़े नेताओं की रणनीति के बीच एक बागी आवाज ने पूरा समीकरण बदल दिया। जीत के बाद गोकुल गीते ने अपने बयान से माहौल और गर्म कर दिया। व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप और सम्मान की लड़ाई ने चुनाव को सिर्फ राजनीतिक मुकाबला नहीं रहने दिया, बल्कि इसे व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का मैदान बना दिया। हमारे देश की राजनीति भी अजब है। कभी मुद्दों की लड़ाई होती है, कभी विचारों की और कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे चुनावी मैदान में पुराने हिसाब की डायरी खुल जाती है। मतदाता चुप रहता है, लेकिन जब बटन दबाता है तो बड़े-बड़े राजनीतिक महारथियों की गणित की किताब उलट देता है।
सातारा की राजनीति में ‘मतों का महाभारत’
सातारा विधान परिषद चुनाव का परिणाम आया और धैर्यशील कदम विजयी घोषित हुए। आंकड़ों ने जीत का एलान कर दिया, लेकिन राजनीति में सिर्फ आंकड़े नहीं बोलते, उनके पीछे छिपी नाराजगी, बगावत और खामोशी भी बहुत कुछ कहती है। कहा जा रहा है कि सौ से ज्यादा वोटों की हलचल ने बड़े-बड़े राजनीतिक समीकरणों को हिला दिया। मतलब साफ है, मंच पर जीत की तालियां बज रही थीं, लेकिन पर्दे के पीछे कई चेहरे अपने-अपने हिसाब से हिसाब-किताब कर रहे थे। जयकुमार गोरे का मजबूत गढ़ समझे जाने वाले क्षेत्र में ही ऐसी हलचल हुई कि राजनीति के पंडितों को भी चश्मा साफ करके देखना पड़ा। राजनीति की यही विडंबना है नेता किला मजबूत समझते हैं, लेकिन किले की दीवारें अक्सर बाहर के हमले से नहीं, अंदर की दरारों से गिरती हैं।
कैमरे के सामने रिश्ते, कैमरे के पीछे सवालों का संसार
बिग बॉस का घर भी किसी राजनीतिक अखाड़े से कम नहीं। यहां भी गुट बनते हैं, दोस्ती होती है, दुश्मनी होती है और आखिर में जनता फैसला करती है। दिव्या अग्रवाल के खुलासों ने फिर वही सवाल खड़ा किया कि कैमरे के सामने जो दिखता है, क्या वही पूरा सच होता है? २४ घंटे कैमरे के सामने रहने वाले प्रतियोगी भी आखिर इंसान ही होते हैं, भावनाएं, रणनीति और प्रसिद्धि की भूख सब साथ चलती है। यहां कुर्सी मुख्यमंत्री की नहीं होती, लेकिन ट्रॉफी के लिए संघर्ष वही पुराना होता है कौन टिकेगा, कौन गिरेगा और कौन दर्शकों के दिल में जगह बनाएगा। ‘वाह रे जमाने! पहले राजा दरबार में नाटक करते थे, अब नेता चुनाव में और कलाकार कैमरे के सामने। कहीं वोटों की गिनती होती है, कहीं टीआरपी की। लेकिन जनता हर जगह एक ही सवाल पूछती है, असली चेहरा कौनसा है और मुखौटा कौनसा?’ क्योंकि आज के युग में सत्ता का मंच हो या मनोरंजन का पर्दा, तमाशा बदलता है, कलाकार नहीं!
