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महाराष्ट्रनामा : ‘किसान की जेब खाली, सरकार की तिजोरी में शर्तों का पहाड़!’

राजन पारकर

किसान की जिंदगी कर्ज के बोझ तले दब रही है और सरकार की योजनाएं शर्तों के बोझ तले दबती नजर आ रही हैं। रोहित पवार ने अन्न त्याग कर सरकार को आईना दिखाने की कोशिश की है। कभी किसान को कर्जमाफी का सपना दिखाया जाता है, तो कभी उसी सपने पर इतनी शर्तों की चादर डाल दी जाती है कि किसान खुद पूछता है- ‘माफी मिली या नई परीक्षा?’
पंढरी में विठ्ठल के सामने आंदोलन हो रहा है, लेकिन सवाल यह है कि किसान की पुकार सत्ता के दरवाजे तक कब पहुंचेगी? ‘किसान अन्न छोड़ रहा है ताकि सरकार की नींद खुले… लेकिन लगता है सत्ता के कानों में अभी भी चुनावी भाषणों का शोर ज्यादा है!’
‘पट्टी छोटी थी, लेकिन राजनीति का रंग बहुत गहरा निकला!’
‘फुटपाथ पर खींची लाइन ने खींच दी समाज और राजनीति के बीच नई लकीर!’ जैन समाज की सफेद पट्टी से शुरू हुआ विवाद अब सांस्कृतिक पहचान, अधिकार और राजनीति की बहस तक पहुंच गया। एक तरफ धार्मिक आस्था का तर्क है, दूसरी तरफ मनसे ने इसे अलग नजरिए से देखा। देखते ही देखते सड़क की एक छोटी सी पट्टी ने पूरे शहर की राजनीति को गर्म कर दिया। मुंबई की सड़कों पर ट्रैफिक कम और विवादों की रफ्तार ज्यादा दिखाई दे रही है। ‘मुंबई में जगह कम पड़ रही थी, अब लगता है विवादों के लिए भी फुटपाथ आरक्षित करने पड़ेंगे!’
‘हंसी की दुकान में मर्यादा का ताला कहां खो गया?’
‘कॉमेडी अगर सीमा पार करे तो तालियां नहीं, जांच की घंटी बजती है!’ हास्य का उद्देश्य समाज को हंसाना होता है, लेकिन जब मजाक संवेदनशीलता की सीमा पार करता है तो वही हंसी विवाद का कारण बन जाती है। प्रणित मोरे के वीडियो कंटेंट को लेकर उठे विवाद के बाद गृह विभाग की जांच की बात सामने आई है। कलाकार की आजादी जरूरी है, लेकिन समाज की संवेदनाओं की कीमत पर मनोरंजन का बाजार सजाना भी सवालों के घेरे में आता है। ‘आजकल कुछ लोग हंसाने के लिए इतनी दूर निकल जाते हैं कि वापस आने के लिए पुलिस की जांच का रास्ता पकड़ना पड़ता है!’
‘महाराष्ट्र की राजनीति और समाज जीवन भी क्या कमाल का रंगमंच है, कहीं किसान पेट खाली रखकर आवाज उठा रहा है, कहीं पट्टी पर प्रतिष्ठा की लड़ाई है और कहीं मजाक की सीमा पर कानून की घंटी बज रही है। जनता बस यही पूछ रही है, असली नाटक कौन कर रहा है और दर्शक कौन बना हुआ है?’

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