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महाराष्ट्रनामा: प्याज, पुलिस और पद की राजनीति 

राजन पारकर

प्याज, पुलिस और पद की राजनीति 

प्याज का भाव बढ़ा, लेकिन सरकार की समझ अब भी सस्ती है! सरकार को जब तक किसान सड़क पर टायर नहीं जलाता, तब तक उसे खेत में जलती हुई उसकी उम्मीदें दिखाई नहीं देतीं। पिछले पंद्रह दिनों में प्याज उत्पादक किसानों ने जो आंदोलन खड़ा किया, उसने सत्ता के गलियारों में ऐसी खलबली मचाई कि दो-दो सरकारी आदेश रातोंरात निकल गए। लेकिन सवाल यह है कि यदि सरकार के आदेश इतने ही चमत्कारी होते, तो किसान आज भी सड़क पर क्यों खड़ा है? दरअसल, सरकार प्याज का भाव बढ़ाने की बात करती है, जबकि किसान अपने पसीने का मूल्य मांग रहा है। दिल्ली में बैठकों का दौर चला, मंत्रियों ने बयान दिए, जीआर निकाले गए, लेकिन किसान के खेत में अभी भी घाटे की फसल उग रही है। यह बड़ा विचित्र गणित है। चुनाव के समय किसान ‘अन्नदाता’ होता है और चुनाव के बाद वही ‘आंदोलनकारी’ बन जाता है। सरकार को यह समझना होगा कि किसान भीख नहीं मांग रहा, अपने श्रम का सम्मान मांग रहा है। प्याज का सवाल केवल बाजार का नहीं, बल्कि किसानों के आत्मसम्मान का प्रश्न है।
जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं तो नागरिक किससे न्याय मांगे?
सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे स्टेशन पर कथित जबरन वसूली के आरोपी पुलिसकर्मियों की अग्रिम जमानत रद्द करते हुए एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है जो लोकतंत्र की आत्मा को झकझोर देता है। अगर कानून की रक्षा करने वाला ही कानून को जेब में रखकर घूमने लगे तो आम आदमी किस दरवाजे पर दस्तक दे? बताया जाता है कि एक यात्री, उसकी नाबालिग बेटी और उसका रिश्तेदार पुलिस के हत्थे चढ़ गए। आरोप है कि डर, धमकी और वर्दी की ताकत का इस्तेमाल करके पैसे वसूले गए। यदि आरोप सही हैं तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि वर्दी पर लगा ऐसा दाग है जो पूरे पुलिस तंत्र की छवि को नुकसान पहुंचाता है। विडंबना देखिए, देश में चोरों से बचाने के लिए पुलिस है और अगर नागरिक को पुलिस से ही बचना पड़े, तो फिर लोकतंत्र की सुरक्षा कौन करेगा? सुप्रीम कोर्ट का यह संदेश केवल तीन पुलिसकर्मियों के लिए नहीं, बल्कि उन सभी के लिए है जो वर्दी को सेवा नहीं, सत्ता का लाइसेंस समझते हैं।
मंत्रिपद का मोह: जनता से ज्यादा कुर्सी की चिंता!
उधर महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया अध्याय खुल गया है। विधायक महोदय पूछ रहे हैं ‘जब मैं विधायक बनकर आया हूं तो मंत्री बनने की अपेक्षा क्यों न रखूं?’ प्रश्न बिल्कुल उचित है। लेकिन जनता भी पूछ सकती है ‘जब हम आपको चुनकर भेजते हैं तो विकास की अपेक्षा क्यों न रखें?’ आज राजनीति का सबसे बड़ा संकट यही है कि चुनाव जीतते ही कुछ नेताओं को जनता नहीं, मंत्रालय दिखाई देने लगता है। सड़कें टूटी रहें, किसान परेशान रहे, बेरोजगार भटकते रहें, लेकिन मंत्रिपद की दौड़ कभी नहीं रुकती। राजनीति अब सेवा का माध्यम कम और पद वितरण का उत्सव ज्यादा दिखाई देने लगी है। मंत्री बनने की इच्छा गलत नहीं, लेकिन जब पद की भूख जनहित पर भारी पड़ने लगे, तब लोकतंत्र का स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है।
जनता का दुर्भाग्य!
एक तरफ किसान अपने प्याज का उचित मूल्य मांग रहा है। दूसरी तरफ नागरिक पुलिस से सुरक्षा की उम्मीद कर रहा है। और तीसरी तरफ नेता मंत्रीपद की गणित में व्यस्त हैं। यानी किसान को भाव नहीं, नागरिक को भरोसा नहीं और राजनीति को विराम नहीं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि जनता हर संकट में कतार में खड़ी रहती है, लेकिन सत्ता हमेशा कुर्सियों की गिनती में व्यस्त रहती है। जब खेत में आंसू, थाने में आरोप और सत्ता में पदलोलुपता एक साथ दिखाई देने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि समस्या किसी एक विभाग की नहीं, बल्कि शासन की सोच की है। जनता अब केवल घोषणाएं नहीं, परिणाम चाहती है। क्योंकि पेट भाषणों से नहीं भरता, न्याय आश्वासनों से नहीं मिलता और लोकतंत्र केवल कुर्सियों से नहीं चलता।

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