डॉ. ममता शशि झा मुंबई
एकटा बहुत प्रसिद्ध ब्रांडक स्कूलक मालिक कुबेराज जी के एकदम झुग्गी-झोपड़ी बला इलाका में घुमईत देखि के पत्रकार सीरि बाबू अचंभित भे गेला। सीरि बाबू आई काल्हि अहि गरीब बस्ती के कव्हरेज के क प्रसिद्ध आ धनी भ रहल छलाह। सामने कुबेराज जी के देखि के चटदनि वैâमरा पर सं हाथ हटा, हुनका दिस कल जोड़ी के प्रणाम के मुद्रा में ठार भे गेला। कुबेराय जी प्रणाम के जबाब देलखिन त बजला ‘धन भाग जे अपनेक दर्शन भेल! मुदा अहां, अहि ठाम!’
कुबेराज जी ‘एत अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खोलि रहल छी, ताहि लेल अहि बस्ती के मानसिकता बूझ लेल अहि ठाम घूमि रहल छी, ओना हमरा मार्केट रिसर्च बला टीम स सबटा जानकारी भेट गेल अछि, मुदा हम अपन नजरिया स अहि बस्ती के देख रहल छी।’
रीसि जी के प्रश्नवाचक मुद्रा देखि के ओ बजला ‘अहांके बजारक नब्ज नहीं बुझल अछि।’ रीसि जी ‘ह आब शिक्षा व्यापार भेल ते विद्यार्थी आ माय- बाप बजारे भे गेल ने।’
कुबेराज जी ‘अहां सनक भावुक लोक सब जे खाली भावना में बहि के बड़का-बड़का चर्चा के क देश में परिवर्तन के ढ़िंढ़ोरा पीट के अलावा किछु नहि करई छई, आ अहिना छोट-छिन सफलता आ कनी-मनी पाई सं कमाक प्रसन्न भे क अपन जीवन बिता दई छई असली में टीक-टिप्पणी के अलावा किछु नहि करई छई। महराज हम कॉलेज स्कूल खोलि के समाज सेबे ने करई छियई, एतेक लोक के रोजगार दई छियई।’
सीरि जी ‘खैर, छोड़ू ई सब, अहांके स्कूल त बड़ नामी-गिरामी अछि आ फीसो बहुत अछि ओहि स्कूल के त अहि गरीबक बस्ती में अहां कोना स्कूल खोलि रहल छी, के ओतेक फीस देत आ दोसर गप्प जे अहांके स्कूल में नाम लिखाब के लेल नियम अछि जे जाहि माय-बाप के अंग्रेजी नहीं बाज अबई छई ओहि बच्चा के नाम नहीं लिखई छियई। एत ते सब छोट-मोट काज कर बला लोक सब छई अंग्रेजी के त कोनो बाते नहि, हिंदीओ में ठीक स नहीं बाजि सकाईया आ ने पढ़ी सकईया! ओहि नियम के की करब।’
कुबेराज जी ‘एहने त लोक चाही, जकर माय-बाप अनपढ़ आ अज्ञानी होई, जकरा हम सब जे कहियई ततबे बुझई। रहल फीस के त अहि के चेरीटेबल ट्रस्ट देखाक बहुत रास टेक्स हटबा लेबई समाज सेवा के नाम पर, कम पाई में शिक्षक रखबई, भरि दिन अलग-अलग क्रिया कलाप में ओझरेने रहबई, जाहि स बच्चा सब स्कूल में पढ ने पबई, व्येह बच्चा सब स्कूल के मास्टर स ट्यूशन पढतई, आ गरीबक बीचक धनी माय-बाप सब अपना स निच्चा बला के सामने ऊंच देखाब लेल सबटा खरच करतई!’
