शीतल अवस्थी
सम्पूर्ण हिंदुस्थान में मकर संक्रांति को विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। विभिन्न प्रांतों में इस त्योहार को मनाने के जितने अधिक रूप प्रचलित हैं, उतने किसी अन्य पर्व में नहीं। यह त्योहार अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग नाम से मनाया जाता है। तमिलनाडु में इसे पोंगल कहते हैं। वहां पोंगल चार दिन तक मनाते हैं। प्रथम दिन भोगी-पोंगल, द्वितीय दिन सूर्य-पोंगल, तृतीय दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल और चौथे व अंतिम दिन कन्या-पोंगल। आंध्रप्रदेश, कर्नाटक व केरला में संक्रांति, हरियाणा और पंजाब में लोहड़ी, नेपाल मे मकर संक्रांति को माघे-संक्रांति, सूर्योत्तरायण और थारू समुदाय में माघी कहा जाता है। समूचे बिहार और उत्तर प्रदेश में इस व्रत को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है।
इस दिन खिचड़ी खाने एवं खिचड़ी दान देने का अत्यधिक महत्व होता है। इस दिन उड़द, चावल, तिल, चिवड़ा, गौ, स्वर्ण, ऊनी वस्त्र, कम्बल आदि दान करने का अपना महत्त्व है। उत्तर प्रदेश में यह मुख्य रूप से ‘दान का पर्व’ है। इलाहाबाद में गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर प्रत्येक वर्ष इस दिन से एक माह तक माघ मेला लगता है जिसे माघ मेले के नाम से जाना जाता है। इससे पुर्व एक माह तक खरमास होता है, जिसमें किसी भी अच्छे काम को अंजाम भी नहीं दिया जाता। परंतु मकर संक्रांति से पृथ्वी पर अच्छे दिनों की शुरूआत होती है और शुभ कार्य शुरू हो जाते हैं। महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएं अपनी पहली संक्रांति पर कपास, तेल व नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। इस दिन तिल-गूड़ बांटने की प्रथा भी है। बंगाल में इस पर्व पर स्नान के पश्चात तिल दान करने की प्रथा है। यहां गंगासागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है। कहा जाता है, ‘सारे तीरथ बार बार, गंगा सागर एक बार।’ असम में मकर संक्रांति को माघ-बिहू अथवा भोगाली-बिहू के नाम से मनाते हैं। राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएं अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। साथ ही महिलाएं किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देती हैं। इस प्रकार मकर संक्रांति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक विविध रूपों में दिखती है। मकर संक्रांति का राष्ट्रव्यापी पर्व मूलत: सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश की पूजा है। यह सूर्य पर्व है, जिसकी आराधना का मूल उद्देश्य आत्मजागृति है। इस पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायणी भी कहते हैं। आध्यात्मिक उपलब्धियों एवं ईश्वर के पूजन-स्मरण के लिए इस संक्रांति काल को विशेष फलदायी माना गया है।
