-टायरों पर गोलियां बरसाकर ले गए नकाबपोश खैबर पख्तूनख्वा में भारी तनाव
-मनमोहन सिंह
रूस के राजनीतिक परिदृश्य में व्लादिमीर पुतिन की सत्ता पर लगातार मजबूत होती पकड़ को वैश्विक स्तर पर एक निष्पक्ष चुनावी जीत से ज्यादा, ‘लोकतंत्र की हार’ के रूप में देखा जा रहा है। लगभग ढाई दशकों से सत्ता के शीर्ष पर बने रहने के बाद, संवैधानिक संशोधनों और राज्य तंत्र के दुरुपयोग के बल पर उनकी यह चुनावी जीत लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों पर गहरा आघात करती है।
लोकतंत्र केवल मतदान कराने या मतपत्रों की गिनती तक सीमित नहीं है। इसका असली आधार स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया, नागरिक स्वतंत्रताएं और एक सशक्त विपक्ष में निहित है। रूस में ये सभी स्तंभ पूरी तरह ध्वस्त कर दिए गए हैं।
पुतिन के शासनकाल में विपक्षी नेताओं, जैसे अलेक्सी नवल्नी को या तो जेलों में बंद किया गया, देश से बाहर कर दिया गया या संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। जब मुख्य राजनीतिक विरोधियों को चुनाव लड़ने से ही अयोग्य घोषित कर दिया जाए और प्रेस की आवाज को दबा दिया जाए, तो ‘प्रचंड बहुमत’ केवल एक प्रायोजित पटकथा बनकर रह जाता है।
पुतिन की यह जीत ‘सत्ता के केंद्रीकरण’ और ‘तानाशाही संस्कृति’ को बढ़ावा देती है। यह इस खतरनाक संदेश को मजबूत करती है कि राज्य तंत्र, मीडिया और न्यायपालिका का नियंत्रण हासिल करके किसी भी व्यवस्था को लोकतांत्रिक दिखाया जा सकता है, जबकि अंदर से वह तानाशाही ही होती है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी, वैश्विक तानाशाही ताकतों को ऐसी चुनावी प्रक्रियाओं से बल मिलता है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती हैं।
अंतत:, रूस में पुतिन की बार-बार की यह जीत जनादेश नहीं, बल्कि दमनकारी नीतियों का परिणाम है। बिना निष्पक्षता, वास्तविक विकल्प और स्वतंत्रता के आयोजित चुनाव लोकतंत्र का उत्सव नहीं, बल्कि उसका जनाजा हैं। यह जीत साबित करती है कि जब तक किसी देश में संस्थागत स्वतंत्रता बहाल नहीं होती, तब तक ऐसी जीतें लोकतंत्र के पतन का ही प्रतीक बनी रहेंगी।
पुतिन के समर्थन में
राष्ट्रीय स्थिरता और सुरक्षा: रूस का एक बड़ा वर्ग पुतिन को एक ऐसे मजबूत नेता के रूप में देखता है जिसने १९९० के दशक के संकट के बाद देश में आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता लाई।
बाहरी ताकतों के खिलाफ एकजुटता: पश्चिमी देशों (विशेषकर नाटो और अमेरिका) के आर्थिक प्रतिबंधों और दबाव के बीच, रूसी जनता नेतृत्व में किसी भी बदलाव को देश की सुरक्षा के लिए खतरा मानती है।
संप्रभु लोकतंत्र: रूसी प्रशासन का तर्क है कि हर देश की अपनी राजनीतिक संस्कृति होती है और रूस को पश्चिमी देशों के लोकतांत्रिक मानकों पर नहीं परखा जाना चाहिए।
