हिमांशु राज़
राम गोपाल वर्मा ने धुरंधर में रणवीर सिंह की एक्टिंग को सराहते हुए कहा कि यह दर्शकों के दिल-दिमाग पर अमिट छाप छोड़ती है। उनकी नजरों में इसकी ताकत है समझदारी, संयम और पारंपरिक हीरोपंती से दूरी। वर्मा जी कहते हैं, “यह सिर्फ फिल्म की समझ नहीं, रणवीर की इंटेलिजेंस भी है। 26/11 हमलों के सीन में जब चारों तरफ जश्न का माहौल है, सब हंस-खेल रहे हैं, तब आपकी नजर सिर्फ रणवीर पर टिक जाती है। उनके पास कोई डायलॉग नहीं, एक्सप्रेशन भी स्थिर। क्योंकि किरदार अपनी भावनाओं को जाहिर ही नहीं कर सकता।”हम ऐसी फिल्मों के आदी हैं जहां हीरो स्लो-मो एंट्री मारता है, दमदार डायलॉग फेंकता है। लेकिन धुरंधर में लगभग सभी कलाकारों के स्लो-मो शॉट्स हैं, रणवीर के एक भी नहीं। भीड़ और अफरा-तफरी के बीच उनकी चुप्पी, ठहराव ही कैमरा और दर्शकों को बांध लेता है। आज की फिल्मों में असर का मतलब तेज संवाद, जोरदार बैकग्राउंड स्कोर होता है, लेकिन रणवीर उलटे रास्ते पर चलते हैं—चुप्पी से गहरा प्रभाव।दर्शक, आलोचक और इंडस्ट्री वाले इस नियंत्रित अभिनय की तारीफ कर रहे हैं। कईयों ने इसे रणवीर की अब तक की सर्वश्रेष्ठ परफॉर्मेंस बताया, जहां दिखावटी भावनाओं को दबाकर सच्ची बेचैनी उभरती है। पार्ट 1 में हमजा के किरदार ने मास अपील दिखाई, बॉक्स ऑफिस तोड़ा। अब पार्ट 2 जस्किरत के बैकग्राउंड पर—तमाशे से मनोविज्ञान की ओर। किरदार की मानसिकता, उसके बनने की वजहें खुलेंगी, जो कहानी को नई गहराई देंगी।अगर पार्ट 1 ने इतिहास रचा, पार्ट 2 वैसी ही रफ्तार पकड़े तो रणवीर सिंह तुलना से ऊपर विरासत छोड़ेंगे। सवाल गंभीर—क्या आने वाला समय कोई उनकी बराबरी कर पाएगा?
