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संस्मरण : सेंट्रल विस्टा मेरे वक्त का

-डाॅ. रवीन्द्र कुमार

आजकल यह टर्म पुनः लिखा-बोला-सुना जा रहा है। इंडिया गेट से राष्ट्रपति भवन तक उसके किनारे-किनारे बने इलाके के लिए आजकल न्यूज़ में है। मैं बात कर रहा हूँ सन 1950 के दशक और 1960 के प्रारम्भिक बरसों की। तब हम जनपथ पर रहते थे। जनपथ का नाम पूर्व में क्वींस वे था। हमने यह टर्म खूब यूज़ किया है। बस में भी क्वींस वे कहा करते थे। तब इस रूट पर 17 नंबर की डी टी यू की बस चलती थी जो पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से महरौली तक जाती थी। यही डी टी यू बाद में डी टी सी कहलाई। चलिये तो शुरू करते हैं जहां से जनपथ शुरू होता है अर्थात औरंगजेब रोड (ए पी जे अब्दुल कलाम रोड) जहां से कटता है। इस राउंड एबाउट (गोल चक्कर) के एक किनारे क्लेरिज़िज़ होटल है दूसरी ओर प्रसिद्ध 10 औरंगज़ेब रोड है जहां अपने दिल्ली प्रवास के दौरान मुहम्मद अली जिन्ना रहा करते थे। 1 जनपथ प्राइवेट बंगला है जिसमें कभी सर सोभा सिंह रहा करते थे। यह बंगला ‘बैकुंठ’ आज भी उन्हीं का है। इसके एक भाग में उनके नाम से कोई ट्रस्ट चलता है। बंगला शायद हंगरी के राजदूत का निवास है। यदि आप 1 जनपथ की तरफ से आ रहे हैं तो आपके बाएँ हाथ वाले सभी बंगले ऑड नंबर (विषम संख्या) में हैं जबकि दाहिने हाथ के बंगले सम संख्या ईवन नंबर के हैं।

जिसे आजकल मोतीलाल नेहरू मार्ग कहते हैं वह पहले यॉर्क रोड था और गोल चक्कर के आसपास के किनारे वाले बंगले अब मोतीलाल नेहरू प्लेस कहलाते हैं तब ये यॉर्क प्लेस कहलाते थे। इसी के 17 यॉर्क रोड की अभी बहुत बड़ी रकम के एवज़ में खरीद – फरोख्त हुई है। कभी पंडित नेहरू का यह आवास था (तीन मूर्ति में शिफ्ट होने से पहले) इसी जनपथ रोड के 10 नंबर के बंगले में लाल बहादुर शास्त्री रहा करते थे भारत के प्रधान मंत्री की हैसियत से। हमारी बस जो पहले सीधे-सीधे 10 जनपथ के सामने से गुजरती थी वह अब गोल चक्कर से एडवर्ड रोड (मौलाना आज़ाद रोड) पर आ जाती थी और मीना बाग तथा निर्माण भवन वाली सड़क से मोतीलाल नेहरू रोड पर आकर गोल चक्कर का पूरा चक्कर लगा कर पुनः जनपथ रोड पर आ जाती थी। अब पता नहीं यह सुरक्षा की दृष्टि से किया जाता था या शोर से बचने के लिए। कारण कि अन्य वाहन सामने से गुजर सकते थे। इस प्रसिद्ध बंगले में बाद में यूथ कॉंग्रेस का दफ्तर भी बना और उनके फंक्शन इसी के लॉन में होते थे। बाद में राजीव गांधी यहाँ रहने आए जब वे प्रधान मंत्री नहीं रहे थे। सोनिया गांधी आज भी इसी बंगले में रहती हैं और दूसरी तरफ के दूसरे बंगले में लालबहादुर शास्त्री जी की स्मृति को अर्पित किया हुआ है। आज भी दूर-दूर से लालबहादुर शास्त्री जी की स्मृति में यहाँ आते हैं। साथ ही पर्यटक भी आते हैं।

10 जनपथ के साथ से ही एडवर्ड रोड (मौलाना आज़ाद रोड) जा रही है। इसी रोड पर कभी मौलाना आज़ाद रहा करते थे। विख्यात विज्ञान भवन भी इसी रोड पर है। विज्ञान भवन के सामने का इलाका मीना बाग के नाम से जाना जाता है। यहाँ सांसदों के दो मंज़िला फ्लैट बने हुए हैं। दूसरी ओर पहले कभी एडवर्ड मैस हुआ करती थी। इसकी बैरक्स के लॉन में मैंने भारत भूषण की ‘ग्यारह हज़ार लड़कियां’ फिल्म देखी थी। शायद फ्री में दिखाई गयी थी। अब तो उस रोड पर निर्माण भवन, उद्योग भवन स्थित है। हाँ तो जनपथ रोड पर आगे बढ़ते हैं। दाहिने हाथ पर राष्ट्रीय संग्रहालय ( नेशनल म्यूजियम) है। जहां हम फिल्म (डॉकुमेंट्री) देखने जाते थे। नेशनल म्यूजियम में एक ऑडिटोरियम और एक लाइब्रेरी भी है। साथ ही तीन-चार मंज़िल में सिंधु घाटी की सभ्यता से लेकर ऐतहासिक अवशेष रखे गए हैं। तब इसके साथ ही पुरातत्व विभाग का ऑफिस भी था वहीं पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ जी के जुलूस का रथ भी रखा रहता था। सभवतः अब यह रथ प्रगति मैदान के पास शिफ्ट कर दिया है। पूरा दफ्तर ही शिफ्ट हो गया है। सिकंदरा रोड पर पहले जहां ईरान का कल्चरल सेंटर था अब उसी स्थान पर यह दफ्तर है, सिकंदरा रोड बहुत ऐतहासिक रोड है। इस पर लेडी इरविन कॉलेज है जिसमें कभी मिसेज लियाक़त अली पढ़ाया करती थीं। यह कॉलेज केवल महिलाओं के लिए है। इसी रोड पर सेठ डालमिया और गढ़वाल हाउस हुआ करते थे। साथ ही बहावलपुर हाउस है जिसमें अब एन एस डी चला करती है। (नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा) बहावलपुर हाउस में बहुर समय तक अमेरिकन लाइब्रेरी भी चली थी जब उनका मूल स्थान 24 कर्ज़न रोड (अब कस्तूरबा गांधी रोड) का पुनर्निर्माण हो रहा था। पहले ये मात्र एक से कोठी से चलता था। मज़े की बात है रशियन लाइब्रेरी और कल्चरल सेंटर 24 फिरोजशाह रोड से चलता है पुनर्निर्माण उन्होने भी किया। वे भी एक छोटी सी कोठी से बड़े भवन से संचालित होता है। एक समारोह में मैंने बलराज साहनी को देखा था। बलराज साहनी जी का कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रेम किसी से छुपा नहीं था। उनके बड़े भाई भीष्म साहनी दिल्ली में ही रहते थे। बहावलपुर हाउस में मैंने आर्मस्ट्रॉंग एंड पार्टी द्वारा चाँद से लाया गया पत्थर का टुकड़ा देखा था। जिसे हीरे की तरह शीशे के डिब्बे में रखा हुआ था जैसे फिल्मों में दिखाते हैं। (क्रमश:)

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