अनिल तिवारी
सड़कों पर बढ़ते ट्रैफिक जाम की एक बड़ी वजह लॉजिस्टिक सप्लाई का तेज विस्तार है। आज दूध, सब्जी, फल, फूल से लेकर घरेलू सामान तक ई-कॉमर्स से मंगाया जा रहा है। इससे वेयरहाउस तक माल ढुलाई और घर-घर डिलिवरी करनेवाले वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में रेलवे आधारित लॉजिस्टिक परिवहन को मजबूत करना समय की बड़ी जरूरत है।
भरोसे की कमी!
आज रेलवे कंटेनर कॉरपोरेशन यानी कॉनकॉर के माध्यम से २० और ४० फीट के बड़े कंटेनरों का परिवहन होता है, लेकिन इसका लाभ मुख्यत: पोर्ट, औद्योगिक इकाइयों और बड़े कारोबारियों तक सीमित है। छोटे व्यापारी, मध्यम उद्योग और घरेलू उपभोक्ता आज भी ट्रक-टेंपो पर निर्भर हैं, जबकि लंबी दूरी पर रेलवे अपेक्षाकृत सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल माध्यम हो सकता है। भारतीय रेलवे की पार्सल सेवा में एसएलआर और पार्सल वैन के माध्यम से छोटे माल की ढुलाई की व्यवस्था है, लेकिन व्यवहार में इसकी जटिल प्रक्रिया, स्टाफ और हैंडलरों का रूखा व्यवहार, एजेंटों का दबदबा, देरी, पारदर्शिता की कमी और भ्रष्टाचार जैसी शिकायतें इसे आम नागरिकों के लिए अविश्वसनीय बनाती हैं। रेलवे की अपनी पार्सल वेबसाइट पर ऑनलाइन बुकिंग, मालभाड़ा गणना और पार्सल नियमों जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं, पर जमीन पर प्रक्रिया अब भी सरल और उपभोक्ता-केंद्रित नहीं बन सकी है।
निजिकरण पर्याय नहीं
रेलवे के एसएलआर कोच और पार्सल वैन कई मार्गों पर पूरी क्षमता से उपयोग नहीं हो पाते, जबकि सड़कों पर लॉजिस्टिक का बोझ बढ़ता जा रहा है। रेलवे को अब २० और ४० फीट कंटेनर व्यवस्था के साथ-साथ छोटे और मध्यम आकार के माल के लिए नई पॉइंट-टू-पॉइंट प्रणाली विकसित करनी चाहिए। इसके लिए सेवानिवृत्त आईसीएफ और एलएचबी कोचों को कॉनकॉर की कंटेनर ट्रेनों की तर्ज पर छोटे लॉजिस्टिक मॉड्यूल में बदला जा सकता है। इनमें ५ बाय ५ फीट या १० बाय १० फीट के सुरक्षित मिनी-कंटेनर रखे जाएं, जिन्हें छोटी क्रेन या विशेष लोडिंग सिस्टम से तुरंत चढ़ाया-उतारा जा सके। इन छोटे कंटेनरों के अनुरूप विशेष टेंपो और छोटे ट्रक भी डिजाइन किए जाएं, ताकि स्टेशन से दुकान, गोदाम या घर तक माल आसानी से पहुंच सके। इससे बार-बार पैकिंग, टूट-फूट, चोरी, मिसिंग और देरी की समस्या घटेगी। छोटे उद्योगों और व्यापारियों को भरोसेमंद विकल्प मिलेगा, रेलवे की आमदनी बढ़ेगी, ईंधन खर्च घटेगा और सड़कों पर ट्रक-टेंपो का दबाव भी कम होगा।
निजीकरण के नाम पर केवल ठेकेदार बढ़ाने से सुधार नहीं होगा। जरूरत है, डिजिटल बुकिंग, तय समयसीमा, पारदर्शी शुल्क, जीपीएस ट्रैकिंग, जवाबदेह स्टाफ और छोटे कंटेनर आधारित आधुनिक रेलवे पार्सल क्रांति की। तभी रेलवे सचमुच सड़क परिवहन का मजबूत विकल्प बन पाएगी।
पहले रेल पार्सल व्यवस्था सुधारी जाए
प्रधानमंत्री की रेलवे पार्सल व्यवस्था अपनाने की अपील महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे सड़क परिवहन पर दबाव और ईंधन खर्च घट सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या रेलवे की मौजूदा पार्सल व्यवस्था आम नागरिकों और छोटे कारोबारियों के भरोसे लायक रह गई है?
कई पार्सल कार्यालयों में गैर-जिम्मेदार रवैया, उपभोक्ताओं की उपेक्षा, एजेंटों का दबदबा, देरी और कथित अंडर-टेबल संस्कृति आम शिकायत बन चुकी है। निजी ठेकेदारों की भागीदारी से जवाबदेही बढ़ने के बजाय कई जगह व्यवस्था और उलझ गई है। आम आदमी को न प्रक्रिया साफ समझ आती है, न समयबद्ध सेवा मिलती है। जब तक रेलवे पार्सल सेवा को पारदर्शी, डिजिटल, समयबद्ध और जवाबदेह नहीं बनाया जाएगा, तब तक यह छोटे उद्योगों और घरेलू जरूरतों के लिए विश्वसनीय विकल्प नहीं बन सकती। अपील अच्छी है, लेकिन पहले व्यवस्था को क्रांतिकारी ढंग से सुधारना जरूरी है।
