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मुस्लिम वर्ल्ड : हजार अफसर और जहाज! …पाक के बाद ट्रंप से क्या मांगने चले सलमान?

सूफी खान

१८ हवाई जहाजों में १,००० अफसर और पूरा तामझाम। पूरा लावलश्कर लेकर अमेरिका जा रहे हैं। सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अल सऊद। इस्लामिक किंगडम सऊदी अरब के वली अहद प्रिंस सलमान का दौरा अपने आप में बेहद खास होने जा रहा है। क्राउन प्रिंस अपने इस दौरे में अमेरिका से ऐसा कुछ मांगना चाहते हैं, जो भविष्य के लिए सऊदी को उस पूरे खित्ते में इतना ताकतवर बना दे कि कोई भी दुश्मन सऊदी की तरफ देखने से पहले भी दस बार सोचे।
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान आज १७ नवंबर को अमेरिका पहुंच जाएंगे और १८ नवंबर को उनकी अमेरिकी प्रेसिडेंट ट्रंप से मुलाकात है। मीडिया रिपोर्ट बता रही है कि मोहम्मद बिन सलमान अब तक की सबसे भारी और हाई-टेक, मेगा डिमांड लिस्ट भी लेकर अमेरिका जा रहे हैं। अगर अमेरिका इन मांगों को मान लेता है तो ये दोनों देशों के बीच सबसे बड़ी डील मानी जाएगी।
दरअसल, सऊदी अरब को अमेरिका से न्यूक्लियर अम्ब्रेला चाहिए। जी हां, परमाणु छतरी। इसके मायने हैं कि सऊदी को अमेरिका से वो ही गारंटी चाहिए जो जापान और साउथ कोरिया को मिली हुई है। इसके मुताबिक, अगर सऊदी पर कोई भी हमला होता है या उसके खिलाफ किसी भी मुल्क ने न्यूक्लियर हथियार इस्तेमाल किए तो इसके जवाब में सऊदी के लिए न्यूक्लियर पलटवार अमेरिका करे। ये एक ऐसी डिमांड है, जिसके लिए अमेरिका को राजी करना टेढ़ी खीर भी है। लेकिन सऊदी प्रिंस जा ही पूरी मजबूती के साथ रहे हैं, ताकि अमेरिका से उन्हे वो मिल जाए जो उनकी सबसे बड़ी ख्वाहिश है। हाल ही में सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ डिफेंस डील की है, जिसके मुताबिक २५ हजार पाकिस्तानी फौजी भी सऊदी पहुंच चुके हैं। इस डील के तहत भी सऊदी पर हमला पाकिस्तान पर हमला भी माना जाएगा और पाकिस्तान सऊदी को अपनी न्यूक्लियर शील्ड भी देगा। अब सऊदी अमेरिका से भी वैसी ही डील चाहता है। जापान और दक्षिण कोरिया इसी अमेरिकी सुरक्षा छतरी के तहत सुरक्षित हैं। बदले में ये देश खुद परमाणु हथियार नहीं बनाते।
एक्सपर्ट कहते हैं कि अगर बात बन गई तो सऊदी को अमेरिका से एक ऐसा कवच मिलने जा रहा है, जो इजरायल की फौजी ताकत के लिए बड़ा चैलेंज साबित हो सकता है। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अमेरिका से वो डील करने जा रहे हैं, जो कतर के साथ ट्रंप ने की है। लेकिन उससे एक कदम आगे। दरअसल, कतर की राजधानी दोहा में इजरायल के हमले और दो लोगों की मौत के बाद से अरब मुल्कों को समझ में आ गया है कि इजरायल पर कोई एतबार कर ही नहीं सकते। उसकी आक्रामकता का आलम तो ये है कि वो कतर पर हमला करके कहता है कि और करेंगे, बार- बार करेंगे। ऐसे में तेल की दौलत से मालामाल और पेट्रो डॉलर में कारोबार करने वाले अरब मुल्कों, जिनमें सऊदी अरब सबसे आगे है ने आनन-फानन में रूस चीन की तरफ मुड़ना शुरू किया और तो और सऊदी ने तो पाकिस्तान से भी समझौता कर लिया। सऊदी के सलमान अमेरिका से ऐसा कुछ लिखवाना चाह रहे हैं जो आगे तक का बंदोबस्त हो। यानी ट्रंप सत्ता में रहें न रहें, लेकिन डील बरकरार रहे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई मौकों पर चिंता जता चुके हैं कि अगर अमेरिका, सऊदी अरब की रक्षा जरूरतों को पूरा करने से इनकार करता है, तो वो चीन और रूस जैसे अमेरिका के विरोधियों का रुख कर सकता है।
सऊदी को सिर्फ इजरायल का खतरा नहीं है, बल्कि उसे इजरायल से कम खतरा है, लेकिन अंदरखाने वो ईरान को भी अपने लिए चैलेंज मानता है। बड़ी बात ये है कि अमेरिका और सऊदी दोनों ईरान को इलाके की सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं। ये अलग बात है कि ईरान से निपटने की इन दोनों की नीति अलग-अलग रहती है। अमेरिका की तरह सऊदी को भी ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम से खतरा है। यमन में हूती या अंसारुल्लाह फाइटर, जो ईरान के रेजिस्टेंस या मुकावमत का हिस्सा हैं, इनके साथ ही रेड सी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान का दबदबा, जो सऊदी के तेल जहाजों का अहम रास्ता है, ये भी सऊदी की चिंताएं हैं। सऊदी पिछले कुछ सालों से ईरान से रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहा है, लेकिन वो शिया ताकत ईरान पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करता। ईरान समर्थित हूती भी यमन से सऊदी की नाक में दम किए रहते हैं। बड़ा सवाल यही है कि क्या ट्रंप सऊदी के लिए बड़ा दिल दिखाएंगे और उसकी न्यूक्लियर गारंटी लेंगे?

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