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न्यूज  स्कैन : १९ साल बाद भी अधूरा न्याय …निठारी का हॉरर हाउस

खुशबू सिंह

मार डाला जाता था मासूमों को और…
यह कहानी उन मजबूर मां-बाप के अनगिनत आंसुओं की है, जिनकी आवाज को सिस्टम ने अनसुना कर दिया था। बात दिसंबर २००६ की है, जब नोएडा के निठारी गांव में एक भयानक राज सामने आया। अमीरों के बंगलों के ठीक पीछे एक नाला था, जिसने कई मासूम बच्चों की लाशों को छुपा रखा था। जब नाले से इंसानी हड्डियां और खोपड़ियां निकलीं तो पूरे देश का दिल दहल गया। गरीब मजदूर अपनी बच्चों के गायब होने की शिकायतें लेकर महीनों से थानों के चक्कर लगा रहे थे, लेकिन पुलिस ने हमेशा उन्हें डांट-डपटकर भगा दिया। १९ साल तक चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद नवंबर २०२५ में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य आरोपी सुरिंदर कोली को आखिरी केस में भी बरी कर दिया। सबूतों की कमी के चलते न्याय अधूरा रह गया।
जब नाले से मौत का राज बाहर आया
२९ दिसंबर २००६ की वो सुबह निठारी गांव के लिए एक बुरे सपने की शुरुआत थी। D ५ नंबर बंगले के पीछे एक नाले में एक बोरा मिला। जब पुलिस ने उसे खोला तो अंदर १६ मानव खोपड़ियों, हड्डियों और कपड़ों के टुकड़े मिले। यह बंगला व्यापारी मोनिंदर सिंह पंधेर का था, जहां उसका नौकर सुरिंदर कोली रहता था। खबर पैâलने पर माता-पिता दौड़ पड़े, उन्हें याद आया कि उनके १९ बच्चे और लापता थे। कुल ८ बच्चों की पहचान हुई। परिवारों ने बताया कि उन्होंने बार-बार शिकायत की थी, मगर पुलिस टाल दिया करती थी। इस लापरवाही पर ५ पुलिसकर्मियों को सस्पेंड किया गया और मीडिया ने उस कोठी को हॉरर हाउस नाम दिया।
सीबीआई की एंट्री
११ जनवरी २००७ को मामला सीबीआई को सौंपा गया। जांच टीम ने बंगले की तलाशी ली और कोली को गिरफ्तार किया। पूछताछ में कोली ने जो बताया, वो सुनकर सब सुन्न हो गए। उसने कबूल किया कि वह बच्चों को लालच देकर घर लाता था। फिर उनका शोषण करता, गला घोंटकर मार डालता और सबूत मिटाने के लिए लाशों को काटकर नाले में फेंक देता था। कोली ने नरभक्षण यानी इंसान का मांस खाने जैसी भयानक बात भी स्वीकार की। सीबीआई ने कुल १६ चार्जशीट दाखिल कीं, जिसमें कोली पर हत्या, बलात्कार और सबूत मिटाने का इल्जाम था। २००५ से २००६ के बीच कुल १९ बच्चे और जवान लड़कियां लापता हुई थीं।
कोर्ट रूम की सजा और न्याय का पलटना
फरवरी २००९ को गाजियाबाद की स्पेशल कोर्ट ने पहले मामले में कोली और पंधेर दोनों को फांसी की सजा सुनाई। अगले ३ सालों में कोली को ३ और मामलों में मौत की सजा मिली। हर बार कोर्ट ने कोली के खुद के कबूलनामे को ही मुख्य आधार माना। सालों तक कोली फांसी के इंतजार में जेल में रहा। लेकिन जनवरी २०२१ में एक मामले में कोली को सजा हुई, पर पंधेर को सबूत न होने पर बरी कर दिया गया। कोर्ट ने कोली और पंधेर को ज्यादातर मामलों में बरी कर दिया। पंधेर को सभी १६ मामलों से राहत मिल गई।
अधूरा न्याय
पीड़ित परिवारों और सीबीआई ने तुरंत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। ११ नवंबर २०२५ को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अंतिम पैâसला सुनाया। कोर्ट ने माना कि अपराध भयानक थे, लेकिन कानून शक के आधार पर सजा नहीं दे सकता।यह पैâसला आने के बाद निठारी के गरीब परिवार सड़कों पर उतर आए। वे आज भी रोते हुए पूछते हैं कि उनके बच्चों को किसने मारा। उनके लिए न्याय आज भी एक सपना है। निठारी की यह घटना आज भी इस देश के माथे पर एक गहरा दाग है, जो बताता है कि गरीब की आवाज वैâसे दब जाती है और अपराधी कानून की कमियों का फायदा उठाकर वैâसे साफ बच निकलते हैं।

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