मुख्यपृष्ठसमाचारजिलाध्यक्ष की नीतियों से खफा उत्तर भारतीय...उल्हासनगर भाजपा में मचा असंतोष!

जिलाध्यक्ष की नीतियों से खफा उत्तर भारतीय…उल्हासनगर भाजपा में मचा असंतोष!

-हक की लड़ाई में उतरेंगे उत्तर भारतीय…भाजपा के लिए मनपा चुनाव बना चुनौती!

-तड़ीपार और विवादित चेहरों को मिली तरजीह…समर्पित कार्यकर्ता हुए हाशिए पर…भाजपा में गहराता असंतोष!

सामना संवाददाता / उल्हासनगर

मनपा चुनाव की आहट के बीच उल्हासनगर भाजपा में असंतोष की आंच तेज होती दिख रही है। उत्तर भारतीय समाज, जो पार्टी के लिए सदैव भीड़ जुटाने और जनाधार बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता आया है, आज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है। 30 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या होने के बावजूद इस समाज को नई कार्यकारिणी में कोई प्रमुख स्थान न देकर जिलाध्यक्ष राजेश वधरिया ने न केवल राजनीतिक भूल की है, बल्कि भाजपा के लिए आने वाले चुनाव में सिरदर्द भी खड़ा कर दिया है।
पार्टी के भीतर यह चर्चा आम है कि वधरिया के नेतृत्व में संगठन “समावेशी” नहीं बल्कि “पक्षपातपूर्ण” हो गया है। कोर कमेटी से लेकर महासचिव पद तक उत्तर भारतीयों की अनुपस्थिति से असंतोष गहराता जा रहा है। कुछ दिन पूर्व विधायक कुमार आयलानी के कार्यालय में उत्तर भारतीय नेताओं की बैठक हुई थी, जिसमें इस मुद्दे को उठाया गया, लेकिन वहां भी केवल आश्वासन मिला-समाधान नहीं। यह वही स्थिति है, जब नेतृत्व सुनता तो है, लेकिन समझता नहीं।
वरिष्ठ भाजपा नेता चंद्रकांत मिश्रा का कहना है कि जिलाध्यक्ष को हर समाज को संतुलित प्रतिनिधित्व देना चाहिए था, लेकिन उन्होंने न केवल पुराने कार्यकर्ताओं को ठेंगा दिखाया बल्कि ऐसे चेहरों को आगे बढ़ाया जो ‘फोटो पॉलिटिक्स’ के लिए मशहूर हैं। संगठन में निष्ठा की बजाय नज़दीकी और दिखावे की राजनीति बढ़ रही है। कुछ नेताओं ने तो यह तक कहा कि तड़ीपार और विवादित छवि वाले लोगों को जिम्मेदार पद देकर वधरिया ने पार्टी की साख पर धब्बा लगाया है।
उत्तर भारतीय मोर्चा अध्यक्ष लाल बिहारी यादव ने साफ कहा कि अब “झंडा उठाने” या “तालियां बजाने” के लिए उत्तर भारतीय नहीं जुटेंगे। “हम अपने हक की लड़ाई लड़ेंगे। अगर जल्द सुधार नहीं हुआ तो प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण से मुलाकात कर स्थिति स्पष्ट करेंगे।” वहीं पूर्व महासचिव भास्कर मिश्रा का कहना है कि “पार्टी के लिए दिल से काम करने वाले कार्यकर्ताओं को बस भीड़ का हिस्सा बना दिया गया है। यह उपेक्षा अगर जारी रही तो भाजपा को इसका राजनीतिक नुकसान झेलना तय है।”
अब सवाल यह है कि क्या जिलाध्यक्ष राजेश वधरिया समय रहते स्थिति को संभाल पाएंगे या उनका नेतृत्व भाजपा को उल्हासनगर में बड़ी राजनीतिक कीमत चुकवाएगा? उत्तर भारतीयों का सब्र अब जवाब दे रहा है, और इस बार वे केवल भीड़ नहीं-“हक की लड़ाई” लेकर मैदान में उतरने को तैयार हैं।

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