एम एम एस
एक वह जमाना था, जब टेलीफोन-मोबाइल नहीं हुआ करते थे और न ही इंटरनेट। चिट्ठी-पत्रियों से बातचीत होती थी। चिट्ठी पोस्ट करने से लेकर उसके गंतव्य तक पहुंचने में लंबा वक्त लगता था। ऐसे में टेलीग्राम अकेला जरिया था, जिसके चलते खबर तुरंत मिल जाती थी। साधारण हिंदुस्थानी शब्दों में उसे `तार’ कहा जाता था। टेलीग्राम के जरिए मिलने वाला संदेसा अधिकतर नेगेटिव ही माना जाता था। नौकरी आदि के संदेश भी मिलते थे कि `आओ तत्काल ज्वाइन कर लो’, लेकिन दूर-दराज इलाकों में और जंग के दौरान पहुंचने वाले टेलीग्राम संदेश दर्दनाक होते थे। डाकिया भी टेलीग्राम लेकर हर हालत में बेहतर से बेहतर जगह (या बीहड़ से बीहड़ जगह) पहुंच जाता था। टेलीग्राम का अर्थ ही होता था, अर्जेंट!
खैर, समय बीता चला गया… अब तो पलक झपकते ही सब कुछ नजरों के सामने है। चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते… मोबाइल नाम की इस चीज ने सारी दुनिया को समेट कर रख दिया है।
ऐसे में `टेलीग्राम’ शब्द फिर एक बार एक रशियन के दिमाग की उपज से दुनिया भर की जुबान पर चढ़ गया। इस मैसेजिंग सर्विस से लोग डरते भी हैं और बेइंतहा प्यार भी करते हैं। व्हॉट्सऐप भी उसी का दोस्त है। एक बार फिर नीट के लफड़े के चलते सरकार भी टेलीग्राम से डर गई और उस पर रोक लगा दी, भले ही अस्थाई। तर्क यह दिया गया कि टेलीग्राम ही है, जिसकी वजह से नीट का सारा रायता पैâला है।
तो फिर टेलीग्राम बाबू क्यों चुप बैठते! उन्होंने कहा, `हम तो सीधे दिल्ली हाई कोर्ट जाएंगे!’ और पहुंच गए अपनी याचिका लेकर, वो भी तत्काल सुनवाई की गुहार के साथ। टेलीग्राम ने कोर्ट में साफ-साफ कह दिया कि सरकार का यह आदेश `मनमाना’ है और प्राकृतिक न्याय का गला घोंटने जैसा है। परीक्षा की शुचिता बचाने के नाम पर पूरे देश के लाखों वैध यूजर्स की `अभिव्यक्ति की आजादी’ का ही कत्ल कर दिया गया।
इधर टेलीग्राम कोर्ट पहुंचा, उधर विपक्ष को बैठे-बिठाए सरकार पर `राशन-पानी’ लेकर चढ़ने का मौका मिल गया। विपक्ष का सीधा और करारा सवाल है, `साहब, अपनी नाकामी छुपाने के लिए टेलीग्राम को बलि का बकरा क्यों बना रहे हो? और अगर सारी खराबी मैसेजिंग ऐप्स में ही है, तो इसके सगे भाई `व्हॉट्सऐप’ को क्यों बख्श दिया गया?’
खैर, अब देखना यह है कि कोर्ट इस `अस्थाई डिजिटल इमरजेंसी’ पर क्या पैâसला सुनाता है, या फिर हमेशा की तरह सारा रायता पैâलने के बाद सिर्फ बर्तन साफ करने की औपचारिकता निभाई जाएगी!
