मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : मजलिस, मुस्लिम लीग और मुसलमानों की सियासत

इस्लाम की बात : मजलिस, मुस्लिम लीग और मुसलमानों की सियासत

 

सैयद सलमान मुंबई
भारतीय राजनीति में मुसलमानों की नुमाइंदगी का सवाल कोई नया नहीं है, लेकिन इसका जवाब आज भी उतना ही उलझा हुआ है जितना दशकों पहले था। इस उलझन को समझने के लिए कई मुस्लिम नेताओं ने कोशिश तो की, लेकिन सबके अपने-अपने दायरे रहे। हालांकि, केरल में मुस्लिम लीग के २२ विधायकों की जीत के बाद एक बार फिर मुस्लिम सियासत चर्चा में आ गई है।
सियासत के दो रंग!
मुस्लिम लीग की इस कामयाबी के साथ-साथ ओवैसी की एमआईएम से उसकी तुलना होना भी स्वाभाविक है। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम मुस्लिम समाज की आवाज उठाने का दावा करती हैं, लेकिन दोनों की राहें इतनी अलग हैं कि उनकी तुलना खुद एक बड़ा सबक है।
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की बुनियाद १९४८ में रखी गई थी। विभाजन के ठीक बाद, जब मुसलमानों का मनोबल टूटा हुआ था और उनका भविष्य अनिश्चित था। उस दौर में पार्टी के संस्थापकों ने यह समझ लिया था कि मुस्लिम समाज की बेहतरी सिर्फ राजनीतिक भागीदारी से होगी और वह भी राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता के दायरे में रहकर। यह महज उनकी दूरअंदेशी नहीं थी, यह एक सोची-समझी रणनीति थी, जो केरल की जमीन पर बखूबी आजमाई गई।
मुस्लिम लीग केरल में कांग्रेस नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक प्रâंट की प्रमुख सहयोगी रही है। जब भी यूडीएफ सत्ता में आई, लीग के नेता महत्वपूर्ण मंत्री पदों पर रहे। १९५२ से लेकर आज तक लोकसभा में पार्टी की निरंतर उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि धर्मनिरपेक्ष गठबंधन की राजनीति में रहकर भी अपने समाज के हितों की रक्षा की जा सकती है। मुस्लिम लीग का मानना रहा है कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की लड़ाई तभी सफल होती है जब वह अन्य समुदायों के साथ मिलकर, लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ते से लड़ी जाए।
ओवैसी की एआईएमआईएम की कहानी बिल्कुल अलग है। हैदराबाद की गलियों से निकली यह पार्टी आज बिहार, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश तक पैâल चुकी है। ओवैसी की वाकपटुता, उनकी आक्रामक शैली और मुस्लिम अस्मिता के सीधे-सपाट दावे ने उन्हें एक वर्ग में जबरदस्त लोकप्रियता दी है। ऑपरेशन सिंदूर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर पाकिस्तान की आलोचना करने में ओवैसी कई तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों से आगे रहे। इससे उनकी ‘इंडियन फर्स्ट’ छवि को बल मिला, लेकिन यही उनकी सीमा भी है। वह किसी भी दल के साथ ज्यादा दिन तक बंधे नहीं रहना चाहते।
बुनियादी फर्क
मुस्लिम लीग और एआईएमआईएम के बीच का बुनियादी फर्क उनकी राजनीतिक संस्कृति में है। मुस्लिम लीग ने दशकों में यह साबित किया कि मुसलमानों की नुमाइंदगी का मतलब बाकी समाज से टकराव नहीं है। उसकी ताकत गठबंधन में है, अलगाव में नहीं। एमआईएम की राजनीति इसके उलट मुस्लिम पहचान को केंद्र में रखती है और अपनी अलग लकीर खींचती है। यही वजह है कि धर्मनिरपेक्ष पार्टियां मुसलमानों से जुड़े अहम मुद्दों, जैसे कि मॉब लिंचिंग, बुलडोजर राजनीति, वक्फ बिल इत्यादि पर खुलकर बोलने से हिचकती हैं। लेकिन इसी खालीपन को भरने की कोशिश एमआईएम करती है। ओवैसी की यह रणनीति ध्रुवीकरण को बढ़ा देती है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा, राजद जैसी सेक्युलर पार्टियां एमआईएम के साथ गठबंधन नहीं कर पातीं।
लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि जज्बाती मुसलमानों में ओवैसी लोकप्रिय होते जा रहे हैं। देखा जाए तो भारतीय मुसलमानों की मनोदशा इन दिनों गहरी कशमकश में है। एक तरफ वे महसूस करते हैं कि धर्मनिरपेक्ष दलों ने उन्हें वोट बैंक से ज्यादा कुछ नहीं समझा। उदाहरण के लिए बिहार २०२५ के चुनावों में एनडीए और महागठबंधन दोनों ने मुस्लिम उम्मीदवारों को कम टिकट दिए, खासकर जीतनेवाली सीटों पर। ऐसे में ओवैसी की आवाज उन्हें अपनी लगती है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी दिखता है कि एमआईएम की राजनीति ने बड़े चुनावी परिणाम कम ही दिए हैं। उन्होंने मुस्लिम वोटों का विभाजन ज्यादा किया है। जिसका फायदा अक्सर उन्हीं दलों को मिला जिनसे मुसलमान सबसे ज्यादा डरते हैं।
फैसला करना होगा
यहीं पर असल सवाल है। ओवैसी को धर्मनिरपेक्ष दलों का साथ इसलिए नहीं मिलता क्योंकि उनकी राजनीति गठबंधन की नहीं, प्रतिस्पर्धा की होती है। वे सेक्युलर स्पेस में साझेदार बनने की जगह उसे चुनौती देते हैं और सियासत का तकाजा यही है कि जो पार्टी चुनावी समीकरणों को बिगाड़े, उसे गले लगाना किसी भी पार्टी के लिए राजनीतिक आत्मघात होगा।
मुस्लिम लीग ने जो रास्ता चुना वह धर्मनिरपेक्षता और गठबंधन का है। वह धीमा जरूर है, लेकिन टिकाऊ भी है। ओवैसी का रास्ता ज्यादा शोरगुल वाला है, ज्यादा दिखनेवाला है, लेकिन उसकी मंजिल अभी दूर है। केरल के शिक्षित मुसलमानों और ओवैसी समर्थक जज्बाती मुसलमानों में यही फर्क है। भारतीय मुसलमानों को ही अंतत: यह तय करना होगा कि उन्हें बुलंद आवाज चाहिए या बेहतर नतीजे क्योंकि हमेशा दोनों एक साथ नहीं मिलते।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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